ब्रिटिश भारत मे क्रषी अर्थव्यवस्था एवं प्रथाये

                                    
दादनी प्रथाइसके अंतर्गत अंग्रेज व्यापारी भारतीय श्रमिकों शिल्पियों को रुपये अग्रिम संविदा ( Advance ) के रूप में देते थे । यह मोटे तोर पर लागत या मार्केट मूल्य से काफी कम होता था। 17 वीं और 18 वीं सदी के दौरान, सूती वस्त्र उत्पादन का थोक व्यापारियों, व्यापारियों-बिचौलियों और बुनकरों के बीच समझौते के आधार पर आयोजित किया गया था, जिसमें मात्रा, गुणवत्ता, कीमत और वितरण की तारीख जैसे विवरण निर्दिष्ट किए गए थे। कॉन्ट्रैक्ट के अंतिम मूल्य का हिस्सा आमतौर पर बुनकरों को कच्चे माल की खरीद और उत्पादन की अवधि के दौरान अपने परिवार के खर्च को बनाए रखने के लिए पेश किया जाता था। भुगतान या तो नकद या कच्चे माल में किए जाते थे। उत्पादन संगठन की प्रणाली के रूप में जाना जाता है। ददनी या अनुबंध मद्रास को छोड़कर एक अखिल भारतीय घटना थी।
कमियौटी प्रथा कमियौटी प्रथा – बिहार एवं उड़ीसा में प्रचलित इस प्रथा के अन्तर्गत कृषि दास के रूप में खेती करने वाले कमियाँ जाति के लोग अपने मालिकों द्वारा प्राप्त ऋण पर दी जाने वाली ब्याज की राशि के बदले में जीवन भर उनकी सेवा करते थे।
तीन कठिया प्रथाचंपारन ( बिहार ) क्षेत्र में प्रचलित इस प्रथा में कृषकों को अंग्रेज बागान मालिकों के अनुबंध के अनुसार भूमि के 3/20 भाग पर नील की खेती करना आवश्यक था ।
दुबला हाली प्रथाभारत के पश्चिमी क्षेत्र मुख्यतः सूरत प्रथा ( गुजरात ) क्षेत्र में प्रचलित इस प्रथा के अंतर्गत दुबला हाली भूदास अपनी संपत्ति का और स्वयं का संरक्षक अपने मालिकों को ही मानते थे ।
गिरमिटिया प्रथा19 वीं शताब्दी के तीसरे दशक में शुरू की गई इस प्रथा में भारतीय श्रमिकों को एक समझौते के अंतर्गत 5 या 7 वर्ष के लिये विदेशों में मजदूरी करनी होती थी । इस समझौते को गिरमिट तथा इस प्रथा को गिरमिटया प्रथा कहा जाता था ।

अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई भू-राजस्व नीतिया

अंग्रेज़ो का एक ही उदेश्य था कंपनी को अधिक से अधिक्म फायदा । अंग्रेज़ों ने अपने बढ़ते हुए खर्चों की पूर्ति और अधिक मात्रा में धन कमाने के उद्देश्य से भारत के पारंपरिक भू-व्यवस्था में हस्तक्षेप करना प्रारंभ किया। आरंभ में क्लाइव और उसके उत्तराधिकारियों ने व्यापक बदलाव न करते हुए बिचौलियों की माध्यम से भू-राजस्व की वसूली की।

इसके बाद विभिन्न प्रशासकों ने विभिन्न क्षेत्रों में कई प्रकार की भू-राजस्व व्यवास्थाएँ चलाईं। जैसे- इज़ारेदारी प्रथा, स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी व्यवस्था।

इज़ारेदारी व्यवस्था

सर्वप्रथम वारेन हेस्टिंग्स ने बंगाल में सन् 1772 में ‘इज़ारेदारी प्रथा’ की शुरुआत की। यह एक पंचवर्षीय व्यवस्था थी, जिसमें सबसे ऊँची बोली लगाने वाले को भूमि ठेके पर दी जाती थी। सन् 1777 में पंचवर्षीय ठेके को वार्षिक कर दिया गया।

स्थायी बंदोबस्त या ज़मींदारी व्यवस्था

कार्नवालिस ने इज़ारेदारी व्यवस्था के दोषों को दूर करने के उद्देश्य से ‘स्थायी बंदोबस्त’ आरंभ की। यह व्यवस्था बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस और उत्तरी कर्नाटक में लागू की गई। स्थायी बंदोबस्त के तहत ज़मींदारों को भूमि का स्थायी मालिक बना दिया गया।

स्थायी बंदोबस्त के तहत ज़मींदार किसानों से वसूले गए कुल रकम का दस भाग (10/11 भाग) कंपनी को देते थे एवं शेष 1/11 भाग स्वयं रखते थे। यदि कोई ज़मींदार निर्धारित तिथि तक भू-राजस्व की निश्चित राशि नहीं जमा करता था तो उसकी ज़मींदारी नीलम कर दी जाती थी।

रैयतवाड़ी व्यवस्था

सन् 1802 में मद्रास के तत्कालीन गवर्नर टॉमस मुनरो ने रैयतवाड़ी व्यवस्था आरंभ की। यह व्यवस्था मद्रास, बंबई एवं असम के कुछ भागों में लागू की गई।

रैयतवाड़ी व्यवस्था के तहत लगभग 51 प्रतिशत भूमि आई। इसमें रैयतों या किसानों को भूमि का मालिकाना हक प्रदान किया गया। अब किसान स्वयं कंपनी को भू-राजस्व देने के लिये उत्तरदायी थे। इस व्यवस्था में भू-राजस्व का निर्धारण उपज के आधार पर नहीं बल्कि भूमि की क्षेत्रफल के आधार पर किया गया।

महालवाड़ी व्यवस्था

लार्ड हेस्टिंग्स द्वारा मध्य प्रांत, आगरा एवं पंजाब के क्षेत्रों में एक नई भू-राजस्व व्यवस्था लागू की गई, जिसे  महालवाड़ी व्यवस्था नाम दिया गया। इसके तहत कुल 30 प्रतिशत भूमि आई।

इस व्यवस्था में महाल या गाँव के ज़मींदारों या प्रधानों से बंदोबस्त किया गया। इसमें गाँव के प्रमुख किसानों को भूमि से बेदखल करने का अधिकार था। महालवाड़ी व्यवस्था के तहत लगान का निर्धारण महाल या संपूर्ण गाँव के ऊपज के आधार पर किया जाता था।

अन्य महत्वपूर्ण शब्द

इकता प्रणाली :इक्ता का अर्थ है – धन के स्थान पर तनख्वाह के रुप में भूमि प्रदान करना।

सर्वप्रथम इक्ता का प्रचलन अब्बासी खलीफाओं के समय में आरंभ हुआ। खलीफाओं के समय में सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तन के परिणामस्वरुप राज्य की शक्ति में कमी आई। जिसके कारण राज्य के सैनिक तथा असैनिक अधिकारियों के खर्चे को पूरा करने के लिए इक्ता प्रणाली विकसित की गई। वित्तीय कठिनाई से निपटने के लिए सैनिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों को भूखंड बांटे जाने लगे जो इक्ता कहलाते थे। इक्ता प्राप्त करने वाले उस भूभाग के मालिक नहीं थे बल्कि उस भूखंड से आने वाले भू राजस्व का उपभोग करते थे। अब्बासी खलीफाओं से प्रेरित होकर बुवाईदो , दो सल्जुको , हम दानियों , गजनी तथा खुरासान के शासकों ने भी इस व्यवस्था को अपनाया। बाद में चलकर तुर्कों ने भी इस व्यवस्था के द्वारा भारत में शम्स-उद-दीन इल्तुतमिश ने ‘इक्ता’ प्रणाली प्रारम्भ की।

जागीरदार व्यवस्था :

यह भूमि की रैयतदारी प्रणाली थी, जिसमें किसी भूमि से लगान प्राप्त करने और उसके प्रशासन की ज़िम्मेदारी राज्य के एक अधिकारी को दी जाती थी। किसी जागीरदार को जागीर सौंपा जाना सशर्त या बिना शर्त भी हो सकता था। इस प्रथा के अंतर्गत सरदारों को नकद वेतन न देकर जागीरें प्रदान कर दी जाती थीं। उन्हें इन जागीरों का प्रबंध करने तथा मालगुजारी वसूल करने का हक दे दिया जाता था। यह सामंतशाही शासन प्रणाली थी और इससे केंद्रीय सरकार कमज़ोर हो जाती थी। भारत में इसलिए सुल्तान ग़यासुद्दीन बलवन ने इस पर रोक लगा दी और सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलज़ी ने इसे समाप्त कर दिया।

तालुकदारी प्रथा (Taluqdari System)

The term ‘taluqdar’ has different meanings in different parts of India. In Oudh, taluqdar is a great landholder.But in Bengal, a taluqdar is next to zamindar in extent of land control and social status.The big zamindars themselves had created many taluqs under several denominations, such as, junglburi taluq, mazkuri taluq, shikimi taluq, and so on.These were created partly as a strategy of zamindari management and partly as a fiscal policy measure for raising zamindari funds for specific purposes.After the Permanent Settlement, new varieties of taluqs were created by zamindars. Under the pressure of the Permanent Settlement, many zamindars were creating dependent taluqs denominated as pattani taluq, noabad taluq and osat taluq.

मालगुजारी सिस्टम (Malguzari System)

The land tenure prevailing in the erstwhile Central Provinces was known as Malguzari system in which the Malguzar was merely a revenue farmer under the Marathas. When the Marathas came into power in this region, they farmed out the revenues of villages to persons of influence and wealth, who were called Malguzars. During the British Rule, they were given proprietary rights and were held responsible for payment of revenue. If the headman of a village was weak or was for any other reason, unable to answer for the sum the authorities expected, or if a court favourite wanted the village, the headman was replaced without hesitation by a farmer. The farmer, or manager was at first called Mukaddam (the Hindi or Marathi form of Arabic Mugaddam). Under the Malguzari system, the Lambardar/Sadar Lambardar appointed from among the Malguzars, was the revenue engager. Other cultivators were either Absolute occupancy tenant, Occupancy tenant, Sub-tenant, Raiyat-Malik or lessees, who could be ejected from their holdings on various grounds. Malguzar (proprietor or co-sharer) held land under special description, namely, Sir land and Khudkasht land.

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