19वीं शताब्दी में धार्मिक तथा समाज सुधार आंदोलन

पुनर्जागरण तथा समाज सुधार आन्दोलन

आधुनिक शिक्षा तथा पाश्चात्य देशों के सम्पर्क से आधुनिक शिक्षा प्राप्त लोगों में सामाजित चेतना जागी । उन्होंने अनुभव किया कि रूढ़िवादिता व अन्धविश्वासों के कारण ही भारतीय समाज पिछड़ा हुआ है । इस जागृति के फलस्वरूप भारत में पुनर्जागरण की लहर चल पड़ी और समाज सुधार हेतु अनेक संगठनों ने आंदोलन चलाये । इसमें प्रमुख अधोलिखित थे

राजा राममोहन राय :

  • 1816 ई . में कलकत्ता में पाश्चात्य शिक्षा के लिए उन्होंने हिन्दू कालेज की स्थापना की ।
  • अंग्रेजी , यूनानी और हिन्दी की पढ़ाई से राम मोहन राय आधुनिक विचारों की ओर आकर्षित हुए । इन्होंने उपनिषदों का अंग्रेजी में रूपान्तरण किया ।
  • ये ऐसे प्रथम शिक्षित व्यक्ति थे , जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों के विरोध में आवाज उठायी ।
  • इन्हें आधुनिक भारत का जन्मदाता कहा जाता है ।
  • इन्होंने जाति प्रथा , सती प्रथा , मूर्ति पूजा आदि का विरोध किया ।
  • 1867 में केशव चन्द्रसेन ने आदि ब्रह्म समाज की स्थापना की ।
  • ये भारत में पत्रकारिता के जन्मदाता कहे जाते हैं ।
  • 1828 ई . में इन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की । इसका उद्देश्य शाश्वत , सर्वाधार , अपरिवर्त्य ईश्वर की पूजा थी जो सारे विश्व का कर्त्ता और रक्षक है ।
  • 1833 ई . में ब्रिस्टल ( इंग्लैण्ड ) में इनकी मृत्यु हो गयी ।
  • इस संस्था को 1842 ई . में महर्षि देवेन्द्र नाथ टैगोर ने नव जीवन प्रदान किया । केशव चन्द्रसेन ने इसे लोकप्रिय बनाया ।

प्रार्थना समाज :

  • 1867 ई . में केशव चन्द्र सेन की प्रेरणा से बम्बई में एक प्रार्थना समाज की स्थापना की गयी ।
  • इसके प्रमुख नेता महादेव गोविन्द रानाडे तथा एन . जी . चन्द्रावरकर थे ।
  • इसी समाज द्वारा स्थापित दलित जाति मण्डल तथा दक्कन शिक्षा सभा ने प्रशंसनीय कार्य किया ।

आर्य समाज ( 1875 ) :

  • इसके संस्थापक स्वामी दयानन्द थे ।
  • यह आन्दोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रियास्वरूप उदित हुआ था ।
  • स्वामी दयानन्द के गुरू स्वामी विरजानन्द थे । स्वामी दयानन्द तथा उनके गुरू दोनों ही शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते थे ।
  • उन्होंने पुनः वेदों की ओर चलो ‘ तथा ‘ हिन्दुओं के लिए भारत ‘ नारा दिया ।
  • स्वामी दयानन्द का वास्तविक नाम मूलशंकर था ।
  • इनका जनम 1824 में गुजरात की मौरवी रियासत के निवासी एक ब्राह्मण कुल में हुआ ।
  • इन्होंने 1863 ई . में झूठे धर्मों की खण्डिनी पताका लहराई ।
  • 1875 ई . में प्राचीन वैदिक धर्म की पुनः स्थापना के लिए इन्होंने बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की ।
  • स्वामी श्रद्धानन्द ने गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना ( हरिद्वार ) 1902 ई . में की ।
  • सितम्बर , 1897 ई . में शिकागो के धार्मिक सम्मेलन में भाग लेकर इन्होंने वेदों पर भाष्य भी लिखे ।
  • स्वामी जी धार्मिक क्षेत्र में मूर्तिपूजा , बहुदेवतावाद , अवतारवाद , पशुबलि , श्राद्ध और झूठे कर्मकाण्ड तथा अन्धविश्वासों को स्वीकार नहीं करते थे । सामाजिक क्षेत्र में उन्होंने छुआ – छूत , जातिप्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया ।
  • ये पहले समाज सुधारक थे , जिन्होंने शूद्र तथा स्त्री को वेद पढ़ने तथा ऊँची शिक्षा प्राप्त करने , यज्ञोपपवती धारण करने तथा अन्य सभी ऊँची जाति तथा पुरुषों के बराबर अधिकार के लिए आन्दोलन किया ।
  • इनके अनुयायियों ने शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया । इन्होंने ‘ सत्यार्थ प्रकाश ( हिन्दी ) नामक पुस्तक लिखी , जिसे आर्य समाज की बाइबिल कहा जाता है ।
  • इनके अनुयायी स्वामी श्रद्धानन्द ने शूद्धि आन्दोलन प्रारम्भ किया ।

रामकृष्ण मिशन :

  • स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की स्मृति में 1896 ई . में रामकृष्ण मिशन की स्थापना बंगाल के बेलूर में की ।
  • इनका पहला नाम नरेन्द्र नाथा दत्त था । स्वामी विवेकानन्द एक कर्मयोगी और वेदान्ती थे ।
  • 1893 ई . में शिकागो में धर्मों की संसद में भाग लेकर इन्होंने पाश्चात्य जगत को भारतीय संस्कृति व दर्शन से अवगत कराया ।
  • इन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे ऐसे धर्म में विश्वास नहीं करते जो किसी विधवा के आंसू नहीं पोंछ सकता अथवा किसी अनाथ को रोटी नहीं दे सकता ।

थियोसोफिकल सोसायटी :

  • एक रूसी महिला , मैडम एच.पी. ब्लावेटस्की ( 1831-91 ) तथा एक अमरीकन सैनिक अफसर कर्नल एच.एस. आल्कॉट ने 1875 में संयुक्त राज्य अमेरिका में थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना की ।
  • ऐनी बेसेंट ने बनारस में सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल की स्थापना की , जो बाद में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ( BHU ) के रूप में विकसित हुआ ।
  • वे 1875 में भारत आए और मद्रास के निकट 1886 ई . में आड्यार में इसके मुख्य केन्द्र की स्थापना की ।
  • ऐनी बिसेंट ने 1886 ई . में इस सोसायटी में प्रवेश किया और चार साल बाद वे भारत में बस गयीं ।
  • इस सोसायटी का उद्देश्य प्राचीन हिन्दुवाद को पुनः स्थापित करना तथा पुराने विधि विधानों की तार्किक व्याख्या करना था ।

रहनुमाई माजदायान सभा :

  • पारसियों में धर्म सुधार के लिए 1851 ई . में रहनुमाई माजदायान सभा की स्थापना बम्बई में नौरोजी फरदोनजी , दादाभाई नौरोजी , एम.एस. बेंगाली और अन्य लोगों ने की ।

सिक्खों में सुधार :

  • उन्नीसवीं सदी के अन्त में अमृतसर में खालसा कालेज की स्थापना से यह आंदोलन आरम्भ हुआ ।
  • इस एक्ट की सहायता से लेकिन बहुधा सीधी कार्यवाही द्वारा सिक्खों ने भ्रष्ट महंतों को गुरुद्वारों से बाहर निकाल दिया ।
  • ये सुधार 1920 ई . में पंजाब में अकाली आन्दोलन से और तेज हो गए ।
  • इनका मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों के प्रबन्ध को स्वच्छ बनाना था ।
  • अकालियों ने 1922 ई . में नया सिख एक्ट बनाने को विवश किया ।

अहमदिया आन्दोलन :

  • 19 वीं शताब्दी का यह एक प्रसिद्ध मुस्लिम आन्दोलन था ।
  • इसके प्रवर्तक मिर्जा गुलाम अहमद ( 1839-1908 ) थे ।
  • यह आन्दोलन पंजाब के गुरुदासपुर जिले के अन्तर्गत कादियां नगर से हुआ ।
  • मिर्जा साहब ने अपने सिद्धान्तों को अपनी पुस्तक बराहीन – ए – अहमदिया , जो 1880 में प्रकाशीत हुई , में व्याख्यायित किया ।
  • वे बहुविवाह विरोधी थे तथा मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने का सतत् प्रयास करते रहे ।
  • 1891 ई . में मिर्जा साहब ने स्वयं को मसीह – उल- ऊद अथवा वह मसीहा कहा , जिसका वर्णन मुस्लिम धर्म पुस्तकों में है और 1904 ई . में अपने आपको कृष्ण का अवतार कहना आरम्भ कर दिया ।
  • इस आन्दोलन ने भी मुसलमानों में समाज सेवा और विद्या प्रसार में बहुत प्रशंसनीय कार्य किया ।
  • मुसलमानों में सुधार करने के क्षेत्र में सर सैयद अहमद खां तथा मौलवी चिराग दिल्ली का महत्वपूर्ण योगदान है ।
  • चिराग दिल्ली ने ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी की तथा अपने सहधर्मियों को कम्पनी प्रशासन में समुचित स्थान ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया ।

सर सैयद अहमद :

  • सैयद अहमद 1838 में कंपनी की नौकरी में आए तथा 1857 तक स्वामिभक्त बने रहे ।
  • 1875 ई . में इन्होंने अलीगढ़ में एंग्लो – मुस्लिम स्कूल की स्थापना की जो बाद में ( 1921 ई . ) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ( AMU ) के रूप में विख्यात हुआ ।
  • 1857 के बाद उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य और मुसलमानों के बीच बेहतर संबंध बनाने का प्रयास किया ।
  • विदेश से लौटने के बाद इन्होंने मुस्लिम समाज की कुरीतियां त्याग कर पाश्चात्य शिक्षा ग्रहण करने के लिए । प्रेरित किया ।

अन्य सुधार आंदोलन :

  • राजा राम मोहन राय ने बिलियम बैंटिक के काल में 1929 ई . में अधिनियम द्वारा सती प्रथा को समाप्त करा दिया ।
  • बालिका शिशु हत्या को 1765 के बंगाल रेगुलेशन संख्या 21 द्वारा अवैध घोषित कर दिया गया ।
  • 1856 के हिन्दू विधवा पुर्नविवाह अधिनियम के द्वारा विधवा विवाह को कानूनी मान्यता दे दी गई ।
  • इसमें ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने , महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । महाराष्ट्र में केशव करवे ने महिलाओं के उत्थान के लिए बहुमूल्य प्रयास किए ।
  • 1899 में पुणे में करवे ने एक हिन्दू विधवा गृह की स्थापना की थी ।
  • 1916 ई . में करवे ने बम्बई में एक भारतीय महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की ।
  • 1905 में भारतीय जनता के हितों की रक्षा के लिए गोपाल कृष्ण गोखले ने सर्वेन्ट्स ऑफ इंडियन सोसायटी की स्थापना की ।
  • 1911 में श्री नारायण राव मल्हार जोशी ने बम्बई में सामाजिक समस्याओं पर विचार के लिए सोशल सर्विस लीग ( 1910 ) की स्थापना की ।

आत्म – सम्मान आन्दोलन :

  • यह तमिलनाडु में चलाया गया । इसके नेता ई . वी . रामास्वामी नायकर थे ।

सत्यशोधक समाज :

  • इसकी स्थापना ‘ ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र मानव के अधिकारों पर एवं जाति प्रथा जोर दिया ।
  • 1851 में पूना में अछूतों के एक स्कूल की स्थापना की गई ।
  • मद्रास के कारीगर जातियों ने सरकारी नौकरियों से ब्राह्मणों का एकाधिकार समाप्त करने की मांग की और राजस्व बोर्ड को एक आवेदन दिया , जिसमें बिना किसी भेद – भाव के सभी सरकारी ओहदों पर भर्ती करने का आवेदन किया ।
  • उन्होंने 1917 ई . में अब्राह्मणों के हितों के प्रसार के लिए नामक जस्टिस ( न्याय ) एक समाचार पत्र प्रारम्भ किया ।
  • 1932 में गांधीजी ने अखिल भारतीय हरिजन संघ की स्थापना की ।
  • बिहार में जगजीवन राम ने दलितों पर आधारित एक कृषि मजदूर संगठन की स्थापना की ।
  • आन्ध्र में कम्मा तथा रेड्डी दो ब्राह्मण जातियों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर ब्राह्मणों में तरक्की की ।
  • डॉ . भीमराव अम्बेडकर ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी की स्थापना द्वारा दलित किसानों और मजदूरों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया ।

श्रम संघ आन्दोलन :

  • मजदूरों के हित एवं सुविधाओं के लिए प्रयास 1881 ( रिपन ) में ही प्रारम्भ हो गए थे , जब प्रथम कारखाना कानून बनाया गया तथा दूसरा कारखाना कानून 1891 में पारित हुआ ।
  • 1897 में काप , स्थायी सदस्यता तथा स्पष्ट नियमों के साथ पहली बार एक मजदूर संगठन सामने आया , जिसका नाम था ‘ सोसायटी ऑफ रेलवे सरवेंट्स ऑफ इंडिया एण्ड वर्मा ।
  • 1905 में प्रिंटर्स यूनियन कलकत्ता नामक मजदूर संगठन बना ।
  • 1907 ई . में बम्बई पोस्टल यूनियन गठित हुआ ।
  • 1910 ई . में सोशल सर्विस लीग , बम्बई तथा 1910 में ही कामगार हितवर्द्धक सभा आदि की स्थापना हुई ।
  • प्रथम नियमित ट्रेंड यूनियन 1918 ई . में मद्रास में टेक्सटाइल लेबर यूनियन के नाम से वी . पी . वाडिया द्वारा शुरू किया गया ।
  • 1916 में इंडियन सीमैन्स यूनियन 1920 में अहमदाबाद टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन 1920 में इंडियन कालियरी इप्लाइज एसोसियेशन तथा 1920 में जमशेदपुर लेबर एसोसियेशन की स्थापना की गई ।
  • 1920 ई . में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की गई । इसका पहला सम्मेलन 31 अक्टूबर , 1920 को बम्बई हुआ , जिसकी अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की ।
  • 1926 केन्द्रीय विधान सभा ने ट्रेड यूनियन अधिनियम पास किया । 1926 के बाद से ट्रेड यूनियन आन्दोलन में तीव्रता आयी ।
  • 1929 ई . के नागपुर सम्मेलन में उदारवादियों व उग्रवादियों के समूहों के बीच विभाजन हुआ ।
  • एन . एम . जोशी ने एक नए संगठन ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन फेडरेशन का गठन किया ।
  • 1931 ई . में रणदिवे आर . देशपांडे ने ए.आई.टी.यू.सी. को छोड़कर ऑल इंडिया रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की ।
  • 1938 ई . में कम्युनिस्टों ने नागपुर और शोलापुर में एक हड़ताल का आयोजन किया ।
  • सरकार ने कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा दिया । सभी यूनियनों ने मिलकर संघर्ष करना प्रारम्भ किया ।
  • फेडरल असेम्बली में दस तथा प्रांतीय विधायिकाओं में 38 सीटों पर मजदूरों के प्रतिनिधि चुने जाने पर इस आन्दोलन को गति मिली ।
  • 1917 में कांग्रेसी नेताओं ने इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की ।
  • 1948 में समाजवादी नेताओं ने हिन्द मजदूर सभा की स्थापना की ।
  • 1948 में प्रो . के . पी . साह ने यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन किया ।
  • 1928 में देश में अभूतपूर्व औद्योगिक अशान्ति रही । कुल 203 हड़तालें हुईं , जो कि आर्थिक मांगों से नहीं अपितु राजनैतिक विचारों से प्रेरित थीं ।

1940 में भी बहुत सी हड़तालें हुईं , विशेषकर इसलिए कि श्रमिक संगठन राजनैतिक घटनाओं से अलग नहीं रह पाते थे ।

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