white ice formation

जलवायु परिवर्तन- शब्दावली

अनुकूलन अंतराल (Adaptation Gap)

वास्तव में कार्यान्वित किए गए अनुकूलन संबंधी उपायों और सामाजिक स्तर पर निर्धारित लक्ष्यों के मध्य अंतर को अनुकूलन अंतराल के रूप में परिभाषित किया जाता है यह मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन के वहनीय प्रभावों से संबंधित वरीयताओं द्वारा निर्धारित होते हैं तथा समाधान ओं की कमी और प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं को परिलक्षित करते हैं।

अनुकूलन की लागत (Adaptation Costs)

लेन-देन की लागत सहित अनुकूलन योजनाओं को तैयार करने, अनुकूलन उपायों को सुविधाजनक बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने की लागत।

प्रकृति आधारित समाधान(Nature-based Solutions)

प्राकृतिक या संशोधित पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा, संधारणीय प्रबंधन और पुनर्स्थापना हेतु किए गए कार्य यह कार्य सामाजिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से और अनुकूल रूप से समाधान करते हैं साथ ही मानव कल्याण और जैव विविधता के लिए लाभ प्रदान करते हैं।

जलवायु वित्तीयन (Climate Finance)

जलवायु वित्तीय वस्तुत: स्थानीय, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण (सार्वजनिक, निजी और वैकल्पिक स्रोतों से ही प्राप्त) को संदर्भित करता है यह सुमन और अनुकूलन संबंधी कार्रवाई का समर्थन करता है जिससे जलवायु परिवर्तन का सामना करने में सहायता मिलेगी।क्योटो प्रोटोकोल और पेरिस समझौते में अधिक वित्तीय संसाधनों वाले पक्षकारों से वित्तीय सहायता का आह्वान किया गया था ताकि कम संपन्न और अधिक सुबेद्ध देशों की सहायता की जा सके।

वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक (Global climate risk index)

इसे जर्मन वॉच (जर्मनी स्थित एक गैर सरकारी संगठन) द्वारा जारी किया गया है।यह सूचकांक इस तथ्य का विश्लेषण करता है कि मौसम संबंधी क्षति की घटनाओं (चक्रवात, बाढ़, हीट वेव आदि) के प्रभाव से विभिन्न देश और क्षेत्र किस सीमा तक प्रभावित हुए हैं

ट्रिपल इमरजेंसी

मेकिंग पीस विद नेचर नामक शीर्षक से UNEP द्वारा प्रकाशित एक नई रिपोर्ट में “ट्रिपल इमरजेंसी: जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता क्षति और प्रदूषण” पर चर्चा की गई है।यह रिपोर्ट बताती है कि यह तीनों, यथा–जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता क्षति और प्रदूषण कैसे स्व–जनित ग्रहीय संकटों, जो परस्पर एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं, को बढ़ावा देने के साथ-साथ कैसे वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के समक्ष अभूतपूर्व जोखिम उत्पन्न कर सकते हैं।  

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Environment Programme: UNEP)

UNEP एक अग्रणी वैश्विक पर्यावरण प्राधिकरण है जो वैश्विक पर्यावरणीय एजेंडा निर्धारित करता है तथा संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के अंतर्गत सन धारणीय विकास के पर्यावरणीय आयामों के सुसंगत कार्यान्वयन को प्रोत्साहित करता है।मुख्यालय: नैरोबी (केन्या)यह अपने 95% वित्तीय के लिए स्वैच्छिक अंशदान पर निर्भर है।संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (United Nations Environment Assembly: UNEA), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की शासी निकाय हैUNEA पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर निर्णय लेने वाला विश्व का सर्वोच्च नीति निर्माता निकाय है इसमें संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य शामिल हैं।

UNEP-Important Publications on  Environment

आवर प्लेनेट, तुंजा (Tunza), एटलस ऑफ आवर, चेंजिंग एनवायरमेंट, ग्लोबल एनवायरमेंट आउटलुक

UNEP- महत्वपूर्ण पुरस्कार #चैंपियंस ऑफ द अर्थ संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान है। #सीड अवार्ड: यह दुनिया भर के उन अभिनव छोटे स्तर वाले वह स्थानीय रूप से संचालित उद्यमियों का समर्थन करता है जो अपने व्यवसाय मॉडल में सामाजिक और पर्यावरणीय लाभों को एकीकृत करते हैं। #सासाकाबा पुरस्कार: यह उन व्यक्तियों और संगठनों की पहचान करता है जो पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देते हैं।

जलवायु परिवर्तन निष्पादन सूचकांक (Climate change performance Index: CCPI)

जलवायु परिवर्तन निष्पादन सूचकांक (Climate change performance Index: CCPI) के नवीनतम संस्करण में भारत ने दसवां स्थान प्राप्त किया है। यह सूचकांक जर्मन वॉच, न्यू क्लाइमेट इंस्टिट्यूट और क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क द्वारा प्रकाशित किया जाता है।वर्ष 2005 से CCPI को वार्षिक रूप से प्रकाशित किया जा रहा है यह देशों के जलवायु संरक्षण निष्पादन पर दृष्टि रखने वाला स्वतंत्र निगरानी उपकरण है।वर्ष 2017 में CCPI की कार्य प्रणाली में संशोधन किया गया ताकि इसमें वर्ष 2015 के पहले समझौते के तहत ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस या 1.5 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे सीमित करने संबंधी लक्ष्य को पूर्ण रूप से समाविष्ट किया जा सके।वर्ष 2021 के सीसीपीआई में 57 देशों को यूरोपीय संघ के जलवायु संरक्षण निष्पादन का मूल्यांकन और तुलना किया गया है। यह सामूहिक रूप से 90% से अधिक वैश्विक GHG उत्सर्जन के लिए उत्तरदाई है।

ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट की रिपोर्ट {Global carbon project (GCP) reports}

ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट द्वारा ग्लोबल मिथेन बजट (GMB) और ग्लोबल नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) बजट जारी किया गया है ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट (GCP) वस्तुत: फ्यूचर अर्थ द्वारा संचालित एक वैश्विक अनुसंधान परियोजना है तथा यह वर्ल्ड क्लाइमेट रिसर्च प्रोग्राम का एक अनुसंधान भागीदार भी है।इसकी स्थापना वर्ष 2001 में इंटरनेशनल जियोस्फियर बायोस्फीयर प्रोग्राम (IGBP), इंटरनेशनल ह्यूमन डायमेंशन प्रोग्राम ऑन ग्लोबल एनवायरमेंटल चेंज (IHDP), वर्ल्ड क्लाइमेट रिसर्च प्रोग्राम (WCRP) और डायवर्सिटस (Diversitas) के मध्य हुई एक संयुक्त साझेदारी के सहयोग से की गई थी।इस साझेदारी की मदद से अर्थ सिस्टम साइंस पार्टनरशिप (EESP) का गठन किया गया था जिसे बाद में फ्यूचर अर्थ निकाय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।यह वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और उनके कारणों का आकलन करता है इन परियोजनाओं में तीन प्रमुख ग्रीन हाउस गैसों यथा–कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मिथेन (CH4), और नाइट्रस ऑक्साइड (N2O)  तथा शहरी, क्षेत्रीय, संचीय और नकारात्मक उत्सर्जन की दिशा में अनुपूरक प्रयासों के लिए वैश्विक बजट निर्धारित किए गए हैं।      

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC)

  • प्रत्येक 6 या 7 वर्षों में ‘जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल’ (IPCC) आकलन रिपोर्ट तैयार करता है, जो पृथ्वी की जलवायु का सबसे व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन होता है।
  • इसकी स्थापना विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा वर्ष 1988 में की गई थी।
  • आई.पी.सी.सी. स्वयं वैज्ञानिक अनुसंधान में संलग्न नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर के वैज्ञानिकों से जलवायु परिवर्तन से संबंधित सभी प्रासंगिक वैज्ञानिक अध्ययन के तार्किक निष्कर्ष के लिये आग्रह करता है।
  • आकलन रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन के बारे में सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत वैज्ञानिक राय होती है।
  • ये जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये सरकारी नीतियों का आधार बनाते हैं, तथा अंतर्राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन वार्ता के लिये वैज्ञानिक आधार भी प्रदान करते हैं।
  • अब तक पाँच आकलन रिपोर्ट जारी की गई हैं। प्रथम रिपोर्ट वर्ष 1990 में जारी की गई थी। पाँचवीं आकलन रिपोर्ट वर्ष 2014 में पेरिस में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के लिये जारी की गई थी।
  • हाल में, आई.पी.सी.सी. ने अपनी छठी आकलन रिपोर्ट (AR 6) का पहला भाग जारी किया है, जबकि बाकी के दो हिस्से आगामी वर्ष जारी किये जाएँगे।
  • आई.पी.सी.सी. रिपोर्ट वैज्ञानिकों के तीन कार्य समूहों द्वारा तैयार जी जाती है-
  1. वर्किंग ग्रुप- I –  यह जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक आधार से संबंधित है, जो रिपोर्ट हाल में जारी हुई है।
  2. वर्किंग ग्रुप- II – संभावित प्रभावों, कमज़ोरियों और अनुकूलन के मुद्दों को संबोधित करता है।
  3. वर्किंग ग्रुप- III– जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये किये जाने वाले कार्यों से संबंधित है।

टिप्पिंग पॉइंट

टिप्पिंग पॉइंट वो सीमा हैं, जिसपर पहुंचने के बाद जलवायु परिवर्तन को वापस अपनी पूर्व अवस्था में नहीं लाया जा सकता। जर्नल नेचर में छपे एक शोध के अनुसार अब तक नौ टिप्पिंग पॉइंट सक्रिय हो चुके हैं जिनमें –

  • अमेजन वर्षावन
  • आर्कटिक समुद्री बर्फ
  • अटलांटिक सर्कुलेशन
  • उत्तर के जंगल (बोरियल वन)
  • कोरल रीफ्स
  • ग्रीनलैंड बर्फ की चादर
  • परमाफ्रॉस्ट
  • पश्चिम अंटार्कटिक बर्फ की चादर
  • विल्क्स बेसिन, शामिल हैं।

तापमान में वृद्धि जितना ज्यादा होगी, टिपिंग पॉइंट को रोकने के लिए हमारे पास उतना ही कम समय होगा। गतवर्ष हमारे लिए एक सबक है जिसमे दुनिया भर ने मौसम की चरम घटनाओं जैसे बाढ़, सूखा, तूफान, चक्रवात आदि का प्रकोप झेला था। जिसमें अमेरिका में आया हरिकेन, भारत में आए चक्रवात, ऑस्ट्रेलिया और आर्कटिक में हीटवेव, अफ्रीका और एशिया के बड़े हिस्सों में आई बाढ़ और अमेरिका के जंगलों में लगी आग प्रमुख घटनाएं थी। वर्ष 2021 की यूरोप और अमेरिका महाद्वीप की हीट वेव ने साफ़ संकेत दे दिए हैं की जलवायु परिवर्तन का मामला अब एक सीमा से आगे बढ़ चुका है और यदि इसके लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो पूरी दुनिया को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

हीट डोम

  • हीट डोम की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब वायुमंडल गर्म समुद्री हवा को ढक्कन की तरह ढंक लेता है।
  • यह घटना उस समय होती है जब समुद्र के तापमान में बहुत ज्यादा बदलाव आता है। इसकी वजह से समुद्र की गर्म सतह ज्यादा गर्म हवाओं को ऊपर उठने को मजबूर करती हैं जिसे कन्वेक्शन / संवहन कहा जाता है।
  • वायुमंडल का उच्च दबाव और जेट स्ट्रीम्स गर्म हवा को नीचे की ओर धकेलता है। इसके चलते गर्म हवा वातावरण में फैलने लगती है, और वह गर्म चैंबर की तरह काम करने लगती है।
  • उच्च दबाव की वजह से बादल भी ढक्कननुमा डोम से दूर धकेल दिए जाते हैं और नीचे हवा सिकुड़ती है और लू चलने लगती है।
  • अभी जो कनाडा और अमेरिका के एक हिस्से में तापमान कहर बरपा रहा है, उसके पीछे एक्सपर्ट आर्कटिक के ऊपर बने उच्च दबाव वाले वायुमंडलीय विक्षोभ को वजह बता रहे हैं, जिसके चलते तापमान ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
  • हीट डोम की स्थिति में जो लोग बिना एयर कंडिशनर के रहते हैं, उनके लिए अत्यधिक तापमान को झेलना नामुमकिन होने लगता है और अचानक मौतों का सिलसिला शुरू हो जाता है, जैसा कि कनाडा और अमेरिका के कुछ हिस्से में देखने को मिला है।
  • इसके चलते फसल भी बर्बाद हो सकते हैं और हरियाली खत्म हो सकती है, जिससे अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। प्रचंड गर्मी के चलते ऊर्जा की मांग भी बढ़ जाती है।
  • यही नहीं जलवायु की यह घटना जंगल के आग के लिए भी जिम्मेदार हो सकती है, जिसके चलते अमेरिका की काफी हरी जमीन हर साल बर्बाद हो जाती है।

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