समान नागरिक सहिंता ( Uniform Civil Code )

देश के प्रमुख धार्मिक समुदायों के ग्रंथों, रीति-रिवाज़ो और मान्यताओं के आधार पर बनाए गए व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर भारत के सभी नागरिकों के लिये एक समान संहिता बनाने को ही यूनिफार्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता कहते हैं। यूनियन सिविल कोड का अर्थ एक निष्पक्ष कानून है, जिसका किसी धर्म से कोई ताल्लुक नहीं है।

दरअसल, पर्सनल लॉज़ यानी व्यक्तिगत कानूनों के भेदभावपूर्ण प्रावधानों के कारण अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित महिलाओं ने जब-जब न्यायपालिका का दरवाज़ा खटखटाया, तब-तब यूनिफार्म सिविल कोड  का मुद्दा ज्वलंत हो उठा।

समान नागरिक संहिता एक पंथनिरपेक्ष कानून होता है जो सभी धर्मों के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से हर मजहब के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा। वर्तमान में देश हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के अधीन करते हैं। 

फिलहाल मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं।

संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करना अनुच्‍छेद 44 के तहत राज्‍य की जिम्‍मेदारी बताया गया है, लेकिन ये आज तक देश में लागू नहीं हो पाया। इसे लेकर एक बड़ी बहस चलती रही है।  

पृष्ठभूमि

  • समान नागरिक संहिता की अवधारणा का विकास औपनिवेशिक भारत में तब हुआ, जब ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1835 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसमें अपराधों, सबूतों और अनुबंधों जैसे विभिन्न विषयों पर भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता लाने की आवश्यकता पर बल दिया गया, हालाँकि रिपोर्ट में हिंदू और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को इस एकरूपता से बाहर रखने की सिफारिश की गई। 
  • ब्रिटिश शासन के अंत में व्यक्तिगत मुद्दों से निपटने वाले कानूनों की संख्या में वृद्धि ने सरकार को वर्ष 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिये बी.एन. राव समिति गठित करने के लिये मजबूर किया।
  • इन सिफारिशों के आधार पर हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों के लिये निर्वसीयत उत्तराधिकार से संबंधित कानून को संशोधित और संहिताबद्ध करने हेतु वर्ष 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के रूप में एक विधेयक को अपनाया गया।
  • हालाँकि मुस्लिम, इसाई और पारसी लोगों के लिये अलग-अलग व्यक्तिगत कानून थे।
  • कानून में समरूपता लाने के लिये विभिन्न न्यायालयों ने अक्सर अपने निर्णयों में कहा है कि सरकार को एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करना चाहिये।
  • प्रायः यह तर्क दिया जाता है ‘ट्रिपल तलाक’और बहुविवाह जैसी प्रथाएँ एक महिला के सम्मान और उसके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, केंद्र ने सवाल उठाया कि क्या धार्मिक प्रथाओं को दी गई संवैधानिक सुरक्षा उन प्रथाओं तक भी विस्तारित होनी चाहिये जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं।

 क्या है हिन्दू पर्सनल लॉ 

  • भारत में हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल लाया गया। देश में इसके विरोध के बाद इस बिल को चार हिस्सों में बांट दिया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे हिन्दू मैरिज एक्ट, हिन्दू सक्सेशन एक्ट, हिन्दू एडॉप्शन एंड मैंटेनेंस एक्ट और हिन्दू माइनोरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट में बांट दिया था। इस कानून ने महिलाओं को सीधे तौर पर सशक्त बनाया। इनके तहत महिलाओं को पैतृक और पति की संपत्ति में अधिकार मिलता है। इसके अलावा अलग-अलग जातियों के लोगों को एक-दूसरे से शादी करने का अधिकार है लेकिन कोई व्यक्ति एक शादी के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने अपने एक हालिया एक निर्णय में पुरुष उत्तराधिकारियों के समान शर्तों पर हिंदू महिलाओं के पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकारी और सहदायक (संयुक्त कानूनी उत्तराधिकारी) के अधिकार का विस्तार किया है। यह निर्णय हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 से संबंधित है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में  संसोधन

  • हिंदू कानून की मिताक्षरा धारा को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के रूप में संहिताबद्ध किया गया, संपत्ति के वारिस एवं उत्तराधिकार को इसी अधिनियम के तहत प्रबंधित किया गया, जिसने कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में केवल पुरुषों को मान्यता दी।
  • 1956 के अधिनियम को सितंबर 2005 में संशोधित किया गया और वर्ष 2005 से संपत्ति विभाजन के मामले में महिलाओं को सह्दायक/कॉपर्सेंनर के रूप में मान्यता दी गई।
  • SC ने अपने इस निर्णय में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में वर्ष 2005 में किये गए संशोधनों का विस्तार किया, इन संशोधनों के माध्यम से बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार देकर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6 में निहित भेदभाव को दूर किया गया था ।
  • SC के निर्णय के अनुसार, एक हिंदू महिला को पैतृक संपत्ति में संयुक्त उत्तराधिकारी होने का अधिकार जन्म से प्राप्त है, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि उसका पिता जीवित हैं या नहीं।
  • अधिनियम की धारा 6 में संशोधन करते हुए एक कॉपर्सेंनर की पुत्री को भी जन्म से ही पुत्र के समान कॉपर्सेंनर माना गया।
  • इस संशोधन के तहत पुत्री को भी पुत्र के समान अधिकार और देनदारियाँ दी गई।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

  • देश के मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड है। इसके लॉ के  अंतर्गत शादीशुदा मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को महज तीन बार तलाक कहकर तलाक  दे सकता है। हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक के और भी तरीके दिए गए हैं, लेकिन उनमें से तीन बार तलाक भी एक प्रकार का तलाक माना गया है, जिसे कुछ मुस्लिम विद्वान शरीयत के खिलाफ भी बताते हैं। 
  • तलाक के बाद अगर दोनों फिर से शादी करना चाहते हैं तो महिला को पहले किसी  और पुरुष के साथ शादी रचानी होगी, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने होंगे। इसे हलाला कहा जाता है। उससे तलाक लेने के बाद ही वो पहले पति से फिर शादी कर सकती है। इस लॉ में महिलाओं को तलाक के बाद पति से किसी तरह के गुजारे भत्ते या संपत्ति पर अधिकार नहीं दिया गया है बल्कि मेहर अदायगी का नियम है। तलाक लेने के बाद मुस्लिम पुरुष तुरंत शादी कर सकता है जबकि महिला को इद्दत के निश्चित दिन गुज़ारने पड़ते हैं।  

यूनिफॉर्म सिविल कोड एवं वैश्विक परिदृश्य 

एक तरफ भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर बड़ी बहस चल रही है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे कई देश इस कानून को अपने यहां लागू कर चुके हैं।

यूनिफॉर्म सिविल कोड एवं संविधान 

  • स्पष्ट है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने समान नागरिक संहिता को भले ही तत्काल लागू नहीं किया था, लेकिन धारा 44 के जरिए इसकी कल्पना जरूर की थी। वो चाहते थे कि सभी धर्मों और संप्रदायों के लोगों के लिए एक जैसा पर्सनल लॉ हो। इसलिए, उन्होंने नीति निर्देशक सिद्धांत के तहत अपनी भावना का इजहार कर दिया। इस अनुच्छेद के जरिए संविधान निर्माताओं ने साफ कहा कि राज्य इस बात का प्रयास करेगा कि सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बने जिसे पूरे देश में लागू किया जाए।
  • इसी उम्मीद में उन्होंने उस वक्त अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ बनाने का समर्थन किया था। अब संबंधित धर्म के पर्सनल लॉ के मुताबिक ही उसके मानने वालों में शादी, तलाक, गुजारा भत्ता, गोद लेने की प्रक्रिया, विरासत से जुड़े अधिकार आदि तय होते हैं। जिस दिन से देश में समान नागरिक संहिता लागू हो जाएगी, उसी दिन से शादी से लेकर विरासत से जुड़े मामलों में भी सभी धर्मों और समुदायों के लिए एक ही कानून लागू होगा।

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता क्यों

  • पंथनिरपेक्ष देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान विधियां होनी चाहिए और विधि के निर्माण में धर्म के बजाय, सामाजिक एवं आर्थिक हितों का महत्व देना चाहिए। विवाह और उत्तराधिकार एक सामाजिक मुद्दा है, धार्मिक नहीं। हिन्दू धर्मावलंबियों के द्वारा अनेक सामाजिक सुधार किये गए हैं, जिनपर धार्मिक संगठनों के द्वारा आपत्ति व्यक्त की गयी थी, जैसे सती प्रथा को समाप्त करने के विरोध में अनेक संगठनों ने आंदोलन किया था।
  • दुनिया के अनेक ऐसे देश हैं, जहाँ इस्लाम धर्म को मानने वालों की बहुलता है, उन्होंने भी एक समान नागरिक संहिता अपना रखी है। तुर्की, मिस्र एवं पाकिस्तान जैसे देशों में एक से ज्यादा विवाह करना प्रतिबंधित है।
  • विभिन्न नागरिक विधियों के कारण इसका दुरुपयोग होता है तथा सामाजिक सुधार की राह में समस्याएं उत्पन्न होती हैं। अन्य धर्मावलंबियों के द्वारा दो विवाह करने के लिए इस्लाम धर्म अपनाया जाता है।
  • अलग-अलग धर्मों के अलग कानून से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है। समान नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े मामलों के फैसले जल्द होंगे। 
  • शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। वर्तमान में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ यानी निजी कानूनों के तहत करते हैं।
  • सभी के लिए कानून में एक समानता से देश में एकता बढ़ेगी और जिस देश में नागरिकों में एकता होती है, किसी प्रकार वैमनस्य नहीं होता है वह देश तेजी से विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा। दे
  • हर भारतीय पर एक समान कानून लागू होने से देश की राजनीति पर भी असर पड़ेगा और राजनीतिक दल वोट बैंक वाली राजनीति नहीं कर सकेंगे और वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होगा।  
  • समान नागरिक संहिता लागू होने से भारत की महिलाओं की स्थिति में भी सुधार आएगा। कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं। इतना ही नहीं, महिलाओं का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में भी एक समान नियम लागू होंगे। 

समान नागरिक संहिता के विपक्ष में तर्क

  • भारत, विश्व का सर्वाधिक विविधतापूर्ण समाज है, जहाँ सभी लोगों के लिए एक समान विधि का निर्माण संभव नहीं है। एकता का अभिप्राय, सभी लोगों के लिए एक समान विधि का निर्माण करना नहीं है, बल्कि विविधिता में एकता स्थापित करना है।
  • भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में विवाह एवं उत्तराधिकार के बिल्कुल अलग नियम है, जो इनकी परम्पराओं पर आधारित है। और इन्हे समाप्त करना संभव नहीं है। उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए संविधान के छठी(6) अनुसूची के द्वारा जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।
  • समूचे देश में इसे लागू करने के लिए विभिन्न राज्यों का समर्थन भी आवश्यक है। विवाह, उत्तराधिकार जैसे विषय समवर्ती सूची सम्मिलित है, इसलिए राज्यों का सहयोग भी आवश्यक है।
  • समान नागरिक संहिता का विचार निर्विवाद रूप में बेहतर विकल्प है परन्तु इसके निर्माण से पहले विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद करने की आवश्यकता है, और इसे क्रमिक रूप में लागू करने का प्रयत्न किया जाये और सबकी सहमति का ध्यान रखा जाये।

समान नागरिक संहिता लागू नहीं होने से अनेक समस्याएं 

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहुविवाह अर्थात चार निकाह करने की छूट है लेकिन अन्य धर्मो में ‘एक पति-एक पत्नी’ का नियम बहुत कड़ाई से लागू है। बाझपन या नपुंसकता जैसा उचित कारण होने पर भी हिंदू ईसाई पारसी के लिए दूसरा विवाह अपराध है और भारतीय दंड संहिता की धारा 494 में 7 वर्ष की सजा का प्रावधान है इसीलिए कई लोग दूसरा विवाह करने के लिए मुस्लिम धर्म अपना लेते हैं. भारत जैसे सेक्युलर देश में चार निकाह जायज है जबकि इस्लामिक देश पाकिस्तान में पहली बीबी की इजाजत के बिना शौहर दूसरा निकाह नहीं कर सकता हैं. ‘एक विवाह या बहुविवाह’ किसी भी प्रकार से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का विषय है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।
  • विवाह की न्यूनतम उम्र भी सबके लिए एक समान नहीं है। मुस्लिम लड़कियों की वयस्कता की उम्र निर्धारित नहीं है और माहवारी शुरू होने पर लड़की को निकाह योग्य मान लिया जाता है इसीलिए 11-12 वर्ष की उम्र में भी लड़कियों का निकाह किया जाता है जबकि अन्य धर्मो मे लड़कियों की विवाह की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़कों की विवाह की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष है. विश्व स्वास्थ्य संगठन कई बार कह चुका कि 20 वर्ष से पहले लड़की शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होती है और 20 वर्ष से पहले गर्भधारण करना जच्चा-बच्चा दोनों के लिए अत्यधिक हानिकारक है, 20 वर्ष से पहले दोनों ही मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होते हैं, 20 वर्ष से पहले तो बच्चे ग्रेजुएशन भी नहीं कर पाते हैं और 20 वर्ष से पहले बच्चे आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर नहीं होते हैं इसलिए सबके लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष करना अतिआवश्यक है। ‘विवाह की न्यूनतम उम्र’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।
  • तीन तलाक अवैध घोषित होने के बावजूद तलाक-ए-हसन एवं तलाक-ए-अहसन आज भी मान्य है और इनमें भी तलाक का आधार बताने की बाध्यता नहीं है और केवल 3 महीने प्रतीक्षा करना है लेकिन अन्य धर्मो मे केवल न्यायालय के माध्यम से ही विवाह-विच्छेद किया जा सकता है. हिंदू ईसाई पारसी दम्पत्ति आपसी सहमति से भी मौखिक विवाह विच्छेद की सुविधा से वंचित है. मुसलमानों में प्रचलित तलाकों का न्यायपालिका के प्रति जवाबदेही नहीं होने के कारण मुस्लिम औरतों को हमेशा भय के वातावरण में रहना पड़ता है. टर्की जैसे मुस्लिम बाहुल्य देश में भी किसी तरह का मौखिक तलाक मान्य नहीं है. 
  • मुस्लिम कानून मे मौखिक वसीयत एवं दान मान्य है लेकिन अन्य धर्मो मे केवल पंजीकृत वसीयत एवं दान ही मान्य है. मुस्लिम कानून मे एक-तिहाई से अधिक सम्पत्ति का वसीयत नहीं किया जा सकता है जबकि अन्य धर्मो में शतप्रतिशत सम्पत्ति का वसीयत किया जा सकता है. वसीयत और दान किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।
  • मुस्लिम कानून मे ‘उत्तराधिकार’ की व्यवस्था अत्यधिक जटिल है, पैत्रिक सम्पत्ति में पुत्र एवं पुत्रियों के मध्य अत्यधिक भेदभाव है, अन्य धर्मो में भी विवाहोपरान्त अर्जित सम्पत्ति में पत्नी के अधिकार अपरिभाषित हैं और उत्तराधिकार के कानून बहुत जटिल हैं, विवाह के बाद पुत्रियों के पैत्रिक सम्पत्ति में अधिकार सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है और विवाहोपरान्त अर्जित सम्पत्ति में पत्नी के अधिकार अपरिभाषित हैं.  ‘उत्तराधिकार’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।
  • विवाह विच्छेद (तलाक) का आधार भी सबके लिए एक समान नहीं है। व्याभिचार के आधार पर मुस्लिम अपनी बीबी को तलाक दे सकता है लेकिन बीबी अपने शौहर को तलाक नहीं दे सकती है। हिंदू पारसी और ईसाई धर्म में तो व्याभिचार तलाक का ग्राउंड ही नहीं है। कोढ़ जैसी लाइलाज बीमारी  के आधार पर हिंदू और ईसाई धर्म में तलाक हो सकता है लेकिन पारसी और मुस्लिम धर्म में नहीं। कम उम्र में विवाह के आधार पर हिंदू धर्म में विवाह विच्छेद हो सकता है लेकिन पारसी ईसाई मुस्लिम में यह संभव नहीं है।  ‘विवाह विच्छेद’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।
  • गोद लेने का नियम भी हिंदू मुस्लिम पारसी ईसाई के लिए अलग अलग है। मुस्लिम गोद नहीं ले सकता और अन्य धर्मो मे भी पुरुष प्रधानता के साथ गोद व्यवस्था लागू है.  ‘गोद लेने का अधिकार’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि नागरिक और मानवाधिकार  का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।
  • उपरोक्त सभी विषय नागरिक और मानवाधिकार  से सम्बन्धित हैं जिनका न तो धर्म या मजहब से किसी तरह का संबंध है और न तो इन्हें धार्मिक या मजहबी व्यवहार कहा जा सकता है लेकिन आजादी के 73 साल बाद भी धर्म या मजहब के नाम पर महिला-पुरुष में भेदभाव जारी है। हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से ‘समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता’ की कल्पना किया था ताकि सबको समान अधिकार मिले और देश की एकता और अखंडता मजबूत हो लेकिन वोटबैंक राजनीति के कारण ‘समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता’ लागू नहीं किया गया। 

 चुनौतियाँ

सांस्कृतिक विविधता के कारण व्यावहारिक कठिनाइयाँ

भारत के सभी धर्मों, संप्रदायों, जातियों, राज्यों आदि में व्यापक सांस्कृतिक विविधता देखने को मिलती है। यही कारण है कि विवाह जैसे व्यक्तिगत मुद्दों पर आम और एक समान राय बनाना व्यावहारिक रूप से कठिन है। उदाहारण के लिये: हिन्दू धर्म में विवाह को जहाँ एक संस्कार माना जाता है, वहीं मुस्लिम धर्म इसे ‘संविदा’  मानता है।

धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन

भारत में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक तबका और उनका प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं का मानना है कि यूनिफार्म सिविल कोड से उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। दरअसल, ऐसा इस मुद्दे के राजनीतिकरण के कारण हुआ है। दक्षिणपंथी विचारधारा के उग्र समर्थकों का विचार यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय की सभी समस्याओं की जड़ उनके पर्सनल लॉज़ ही हैं, जबकि उन्हें वोट बैंक मानने वाली पार्टियाँ इस संबंध में तुष्टीकरण की नीतियों का पालन करती रहीं हैं, जिससे कट्टरपंथी वर्ग फल-फूल रहा है।

संवेदनशील मुद्दा

यदि यूनिफार्म सिविल कोड लागू करने का निर्णय ले भी लिया गया तो इसे समग्र रूप देना आसान नहीं होगा। इसके लिये न्यायालय को व्यक्तिगत मामलों से संबंधित सभी पहलुओं पर विचार करना होगा। विवाह, तलाक, पुनर्विवाह आदि जैसे मसलों पर किसी धर्म विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँचाए बिना कानून बनाना आसान काम नहीं है।

केंद्र सरकार के पारिवारिक कानूनों में मौजूद अपवाद

  • स्वतंत्रता के बाद से संसद द्वारा अधिनियमित सभी केंद्रीय पारिवारिक कानूनों में प्रारंभिक खंड में यह घोषणा की गई है कि वे ‘जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर पूरे भारत में लागू होंगे।’
  • इन सभी अधिनियमों में 1968 में एक दूसरा अपवाद जोड़ा गया था, जिसके मुताबिक ‘अधिनियम में शामिल कोई भी प्रावधान केंद्रशासित प्रदेश पुद्दुचेरी पर लागू होगा।’
  • एक तीसरे अपवाद के मुताबिक, इन अधिनियमों में से कोई भी गोवा और दमन एवं दीव में लागू नहीं होगा।
  • नगालैंड और मिज़ोरम से संबंधित एक चौथा अपवाद, संविधान के अनुच्छेद 371A और 371G में शामिल किया गया है, जिसके मुताबिक कोई भी संसदीय कानून इन राज्यों के प्रथागत कानूनों और धर्म-आधारित प्रणाली का स्थान नहीं लेगा।

सांप्रदायिक राजनीति

  • कई विश्लेषकों का मत है कि समान नागरिक संहिता की मांग केवल सांप्रदायिक राजनीति के संदर्भ में की जाती है।
  • समाज का एक बड़ा वर्ग सामाजिक सुधार की आड़ में इसे बहुसंख्यकवाद के रूप में देखता है।  

संवैधानिक बाधा

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25, जो किसी भी धर्म को मानने और प्रचार की स्वतंत्रता को संरक्षित करता है, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता की अवधारणा के विरुद्ध है।

समान नागरिक संहिता और उच्च न्यायलय के निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय समान नागरिक संहिता के संदर्भ पर अब तक तीन बार अपने विचार दे चुका है। 

शाहबानों केस (1985)

  • शाहबानों केस समान नागरिक संहिता से जुड़ा हुआ प्रसिद्ध मामला है। इस केस में शाहबानों नामक मुस्लिम महिला को उसके पति के द्वारा तलाक दे दिया गया था। परिणाम स्वरुप  शाहबानों ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में अपने पति से गुजारा भत्ता देने के लिए याचिका दायर की। पति के अनुसार मुस्लिम पर्सनल कानून के अनुसार पति को गुजारा भत्ता देने का प्रावधान नहीं है, परन्तु आपराधिक प्रक्रिया संहिता में महिलाओं को गुजारा प्राप्त करने का अधिकार है।
  • मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने शाहबानो के पति को शाहबानों को गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया। न्यायायल के अनुसार आपराधिक प्रक्रिया, संहिता पर्सनल कानून से ज्यादा महत्वपूर्ण है और यह मामला महिला के अधिकार से सम्बंधित है, जिसे धर्म से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। अपील में उच्चतम न्यायालय ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय को वैधानिक माना।
  • उच्चतम न्यायालय ने शाहबानों वाद, 1986 में सरकार को यह स्पष्ट निर्देश दिया था कि भारत में एक समान नागरिक संहिता का होना आवश्यक है, परन्तु उच्चतम न्यायालय का निर्णय लागू नहीं हो सका क्यों कि, राजीव गाँधी सरकार के द्वारा आपराधिक प्रक्रिया संहिता में संशोधन कर दिया गया, जिसके अनुसार, मुस्लिम महिलाएं तलाक के बाद अपने पति से गुजारा भत्ता की मांग नहीं कर सकती।

सरला मुदगल बनाम भारत संघ( 1995)

उच्चतम न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक महत्व के निर्णय सरला मुदगल बनाम भारत संघ( 1995) मैं प्रधानमंत्री से यह निवेदन किया कि वे संघ के अनुच्छेद 44 पर नया दृष्टिकोण अपनाएं जिसमें सभी नागरिकों के लिए एक सम्मान सिविल संहिता के बनाने का निर्देश दिया गया है और कहा कि ऐसा करना पीड़ित व्यक्ति की रक्षा तथा राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की वृद्धि के लिए आवश्यक है| 

उच्चतम न्यायालय ने बार-बाहर नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने पर बल दिया है| 

जॉन बलवत्तम केस 2003

2003 में जॉन बलवत्तम केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “यह दुख की बात है कि संविधान के अनुच्छेद 44 को आज तक लागू नहीं किया गया, संसद को अभी भी देश में एक समान नागरिक संहिता लागू के लिए कदम उठाना है। समान नागरिक संहिता वैचारिक मतभेदों को दूर कर देश की एकता-अखंडता को मजबूत करने में सहायक होगी।”

जोस पाउलो केस

2019 में जोस पाउलो केस में सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा कि समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार की तरफ से अबतक कोई प्रयास नहीं किया गया। कोर्ट ने अपने टिप्पणी में गोवा का उदाहरण दिया और कहा- “1956 में हिंदू लॉ बनने के 63 साल बीत जाने के बाद भी पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया।

शायरा बानो केस 2016

  • फरवरी 2016 में उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो (38) पहली महिला बनीं, जिन्होंने तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। शायरा की शादी 2002 में इलाहाबाद के एक प्रॉपर्टी डीलर से हुई थी। शायरा का आरोप था कि शादी के बाद उन्हें हर दिन पीटा जाता था। पति हर दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करता था। पति ने उन्हें टेलीग्राम के जरिए तलाकनामा भेजा। वे एक मुफ्ती के पास गईं तो उन्होंने कहा कि टेलीग्राम से भेजा गया तलाक जायज है। शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला के रिवाज को भी चुनौती दी। इसके तहत मुस्लिम महिलाओं को अपने पहले पति के साथ रहने के लिए दूसरे शख्स से दोबारा शादी करनी होती है।
  • आलोचकों के अनुसार यह तुष्टिकरण की निति है। उच्चतम न्यायालय ने हाल के निर्णय में यह भी कहा कि, विवाह का मामला अंतःकरण की स्वतंत्रता से बिलकुल सम्बंधित नहीं है। इसलिए इसको नियंत्रित किया जा सकता है और उच्चतम न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि दूसरे विवाह के लिए धर्मान्तरण करना असंवैधानिक है। न्यायपालिका के अनुसार यह धार्मिक विषय पर आधारित नहीं है, बल्कि महिलाओं के उत्थान से जुड़ा हुआ विषय है।
  • उच्चतम न्यायालय के हाल के निर्णय में यह कहा जा चुका है कि बहु पत्नी प्रथा और तीन बार तलाक कहने का प्रावधान इस्लाम धर्म का मूल भाग नहीं है बल्कि यह महिलाओं से जुड़ा हुआ एक सामाजिक मुद्दा है।

विधि आयोग और समान नागरिक संहिता

  • विधि आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि जरूरी नहीं कि एक एकीकृत राष्ट्र को समानता की आवश्यकता हो बल्कि, हमें मानवाधिकारों पर निर्विवाद तर्कों के साथ अपने मतभेदों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिये।
  • आयोग का मानना है कि निजी कानूनों में फर्क किसी भेदभाव की नहीं बल्कि, एक मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।
  • धर्मनिरपेक्षता शब्द का अर्थ केवल तभी चरितार्थ होता है जब यह किसी भी प्रकार के अंतर की अभिव्यक्ति को आश्वस्त करता है। आयोग ने साफ कहा है कि धार्मिक और क्षेत्रीय दोनों ही विविधता को बहुमत के शोरगुल में कम नहीं किया जा सकता है।
  • आयोग ने सुझाव दिया है कि समान नागरिक संहिता को लागू करने के बजाय सभी निजी कानूनी प्रक्रियाओं को संहिताबद्ध करने की जरूरत है।
  • कानूनों को संहिताबद्ध करने पर व्यक्ति कुछ हद तक दुनिया के उन सिद्धांतों तक पहुँच सकता है जो समान संहिता की बजाय समानता को लागू करने को प्राथमिकता देता है।
  • लैंगिक समानता के मद्देनजर आयोग ने सुझाव दिया है कि लड़कों एवं लड़कियों की शादी के लिए 18 वर्ष की आयु को न्यूनतम मानक के रूप तय किया जाए ताकि वे बराबरी की उम्र में शादी कर सकें।

समान नागरिक संहिता बनाम तीन तलाक़ का मुद्दा

  • काफी समय से ये मन जाता रहा है कि समान नागरिक संहिता लागू होने से भारत की महिलाओं की स्थिति में भी सुधार आएगा। इस्लाम में पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं। इतना ही नहीं, महिलाओं का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में भी एक समान नियम लागू होंगे।  
  • हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते एक बार में तीन तलाक यानी ‘तलाक-ए-बिद्दत’ को असंवैधानिक करार दिया है। दरअसल, इस मुद्दे को लेकर दायर की गई याचिकाओं पर पाँच जजों की संवैधानिक पीठ इस वर्ष 2020 के मई से सुनवाई कर रही थी, इस दौरान न्यायालय ने तीन तलाक के सभी पहलुओं पर विचार किया। इससे पूर्व केन्द्र सरकार ने भी तीन तलाक को मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन बताया था।

मुसलमान सामान नागरिक संहिता के खिलाफ क्यों हैं

मुसलमानों का कहना है कि हमारे लिए अलग से कोई भी कानून बनाने की आवश्यकता नहीं हैं क्योंकि हमारे लिए कानून पहले से ही बने हुए हैं जिनका नाम है शरीयत । हम न इससे एक इंच आगे जा सकते हैं, न एक इंच पीछे. हमें इससे मतलब नहीं है कि बाकी कौम अपने लिए कैसा सिविल कोड चाहते हैं । हमारा सिविल कोड वही होगा जिसकी अनुमति हमारा धर्म देता है।

तीन तलाक़ मामले की पृष्टभूमि 

  • फरवरी 2016 में उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो (38) पहली महिला बनीं, जिन्होंने तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। गौरतलब है कि अक्तूबर 2016 में केंद्र सरकार ने भी सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाकर्त्ता ‘शायरा’ की मांगों का सैद्धांतिक तौर पर समर्थन करते हुए एक हलफनामा दायर किया था। 
  • इस प्रकार, प्रसिद्ध ‘शाह बानो मामले’ के तीन दशक बाद शायरा मामले ने एक बार फिर से लैंगिक समानता बनाम धार्मिक कट्टरपंथ की बहस को हवा दे दी और तीन तलाक पर पूरे देश में ज़ोरदार बहस छिड़ गई। 
  • मामले की गंभीरता की पहचान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह मामला संवैधानिक मुद्दों से संबंधित है, अतः संविधान पीठ को इसकी सुनवाई करनी चाहिये।
  • विदित हो कि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि इस मामले में सिर्फ कानूनी पहलुओं पर ही सुनवाई होगी और न्यायालय तीन तलाक के अलावा किन्ही अन्य माध्यमों से होने वाले तलाक के संबध में विचार नहीं करेगा।
  • दरअसल, मुस्लिम समुदाय में ‘तलाक-ए-बिद्दत’ के अलावा अन्य दो तरीकों से भी तलाक को सहमति प्राप्त है: तलाक-ए-एहसन और तलाक-ए-हसना।

मुस्लिम पर्सनल लॉ  एवं मुस्लिम महिलाओं की स्थिति

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहुविवाह की छूट है यानी चार निकाह किए जा सकते हैं लेकिन दूसरे धर्मों में ‘एक पति-एक पत्नी’ का नियम बहुत कड़ाई से लागू है। बांझपन या नपुंसकता जैसा उचित कारण होने पर भी हिंदुओं, ईसाइयों और पारसियों के लिए दूसरा विवाह करना अपराध है। ऐसा करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 494 में सात साल की सजा का प्रावधान है।
  • विवाह की न्यूनतम उम्र भी सबके लिए एकसमान नहीं है। मुस्लिम लड़कियों के बालिग होने की उम्र तय नहीं है। पीरियड शुरू होने पर मान लिया जाता है कि लड़की निकाह के लायक हो गई। इसीलिए 11-12 साल की लड़कियों का भी निकाह कर दिया जाता है। दूसरे धर्मों मे लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र 18 साल और लड़कों के लिए 21 साल है।
  • तीन तलाक अवैध घोषित होने के बावजूद तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन आज भी जायज हैं। इनमें भी तलाक का आधार बताने की जरूरत नहीं है और 3 महीने इंतजार करना होता है। लेकिन दूसरे धर्मों मे केवल अदालत के जरिए विवाह संबंध खत्म किया जा सकता है। हिंदू, ईसाई और पारसी दंपती चाहें कि आपसी सहमति से मौखिक आधार पर शादी का संबंध तोड़ लें तो ऐसा नहीं कर सकते।
  • मुस्लिम कानून मे मौखिक वसीयत और दान जायज है। दूसरे धर्मों में पंजीकृत वसीयत और दान को ही कानूनी तौर पर सही माना जाता है। मुस्लिम कानून में एक-तिहाई से अधिक संपत्ति की वसीयत नहीं की जा सकती। दूसरे धर्मों में पूरी संपत्ति की वसीयत की जा सकती है।
  • मुस्लिम कानून मे ‘उत्तराधिकार’ की व्यवस्था बहुत जटिल है। पैतृक संपत्ति के मामले में बहुत भेदभाव है बेटे-बेटियों के बीच। दूसरे धर्मों में भी विवाह के बाद अर्जित संपत्ति में पत्नी के अधिकार क्या हैं, यह तय नहीं किया गया है। उत्तराधिकार के कानून बहुत जटिल हैं और विवाह के बाद पैतृक संपत्ति में बेटियों के अधिकार सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है। दूसरे धर्मों में तलाक का आधार भी सबके लिए एकसमान नहीं है। व्यभिचार के आधार पर कोई मुसलमान अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है लेकिन बीवी अपने शौहर को तलाक नहीं दे सकती।
  • हिंदू, पारसी और ईसाई धर्म में तो व्यभिचार को वजह बताकर तलाक लिया ही नहीं जा सकता। कोढ़ जैसी लाइलाज बीमारी के आधार पर हिंदू और ईसाई धर्म में तलाक हो सकता है लेकिन पारसी और मुस्लिम धर्म में नहीं। कम उम्र में विवाह के आधार पर हिंदू धर्म में विवाह संबंध खत्म किया जा सकता है लेकिन पारसियों, ईसाइयों और मुसलमानों में ऐसा नहीं हो सकता। गोद लेने का नियम भी हिंदू, मुस्लिम, पारसी और ईसाई के लिए अलग-अलग है। मुस्लिम गोद नहीं ले सकता। दूसरे धर्मों मे भी पुरुष प्रधानता के साथ गोद व्यवस्था लागू है।

तलाकबिद्दतपर सर्वोच्च न्यायालय निर्णय /विचार 

  • न्यायालय का कहना है कि ‘तलाक-ए-बिद्दत’ इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है, अतः इसे अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता।
  • इसी के साथ न्यायालय ने शरीयत कानून, 1937 की धारा-2 में दी गई “एक बार में तीन तलाक” की मान्यता को रद्द कर दिया।
  • देश की सबसे बड़ी अदालत ने तीन-दो के बहुमत से ‘एक बार में तीन तलाक’ को असंवैधानिक बताते हुए इस पर 6 महीने की रोक लगा दी।
  • इस फैसले में उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर ने कहा कि यह 1400 साल पुरानी परंपरा है जो इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है, अतः न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। 
  • वहीं दूसरी तरफ, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आर.ए.एफ. नरीमन और जस्टिस यू.यू. ललित ने ‘एक बार में तीन तलाक’ को असंवैधानिक ठहराते हुए इसे खारिज़ कर दिया। इन तीनों जजों ने तीन तलाक को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना है। विदित हो कि संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को “विधि के समक्ष समानता” का अधिकार प्रदान करता है।

न्यायालय ने किन बिन्दुओं पर विचार किया 

  • सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार किया:
  • धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु-विवाह की इज़ाज़त संविधान के तहत दी जा सकती है या नहीं?
  • समानता का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में से प्राथमिकता किसको दी जानी चाहिये?
  • पर्सनल लॉ को संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत कानून माना जाएगा या नहीं? 

क्या न्यायालय का यह निर्णय इस्लामिक सिद्धांतों के खिलाफ है?

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लीकेशन एक्ट 1937, मुसलमानों को पर्सनल लॉ के मामलों में कुरान और हदीस के आधार पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
  • हालाँकि, कुरान में तीन तलाक का स्पष्ट संहिताकरण नहीं किया गया है, बल्कि उलेमाओं द्वारा इसकी मनमाफिक व्याख्या की जाती है। साथ ही उन्होंने इन प्रथाओं को दैवीय रूप दिया हुआ है जिसकी वजह से लोग इनका विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
  • देखा जाए तो मुस्लिम महिलाओं को केवल लिंग और धर्म के आधार पर कानून के तहत समान संरक्षण और भेदभाव से सुरक्षा के अधिकार से वंचित किया जा रहा था, और इस बात की पर्याप्त संभावना है कि न्यायालय के इस निर्णय के बाद इस पर रोक लगने की पूरी संभावना है।
  • तीन तलाक का विरोध कर रहे लोगों का तर्क है कि तलाक-ए-बिद्द्त का कुरान में कोई आधार नहीं है और न ही बहु-विवाह इस्लाम का अभिन्न अंग है। हालाँकि मुस्लिम पर्सनल लॉ के संहिताकरण के अभाव में लैंगिक समानता सुनिश्चित करना अभी भी एक टेढ़ी खीर है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त न्यायिक शक्तियों के आधार पर 6 माह के लिये तीन तलाक को प्रतिबंधित अवश्य किया है लेकिन इसे समाप्त केवल विधायी प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है और इसके लिये संसद को महत्त्वपूर्ण कानून बनाने होंगे।

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून 

उच्चतम  न्यायलय के निर्णय के बाद  मुस्लिम महिलाओं से एक साथ तीन तलाक को अपराध करार देने वाले ऐतिहासिक विधेयक कानून बन गया है। इस कानून को 19 सितंबर 2018 से लागू किया गया।

महत्त्व 

  • सर्वप्रथम इससे सामान नागरिक संहिता लागु करने का  प्रशस्त हुआ क्योंकि तीन तलाक़ का मुद्दा सामान को नागरिक संहिता लागु करने में एक प्रमुख बढ़ा के रूप में माना जाता रहा है।
  • तीन तलाक से जुड़े मामले नए कानून के दायरे में आएंगे। वॉट्सऐप, एसएमएस के जरिए तीन तलाक देने से जुड़े मामले भी इस कानून के तहत ही सुने जाएंगे। तीन तलाक की पीड़िता को अपने और नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा-भत्ता मांगने का हक मिलेगा। 
  • तीन तलाक गैर-जमानती अपराध होगा। यानी आरोपी को पुलिस स्टेशन से जमानत नहीं मिलेगी। पीड़ित पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर मजिस्ट्रेट ही जमानत दे सकेंगे। उन्हें पति-पत्नी के बीच सुलह कराकर शादी बरकरार रखने का भी अधिकार होगा। 
  • मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा मां के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपी को उसका भी गुजारा-भत्ता देना होगा। 
  • तीन तलाक का अपराध सिर्फ तभी संज्ञेय होगा, जब पीड़ित पत्नी या उसके परिवार (मायके या ससुराल) के सदस्य एफआईआर दर्ज कराएं।
  • तीन तलाक देने के दोषी पुरुष को तीन साल की सजा देने का प्रावधान है।

यूनिफार्म सिविल कोड और इस्लाम

  • यूनिफार्म सिविल कोड न केवल इस्लाम से बल्कि  हिन्दू और इसाई धर्मों से भी संबंधित है। जहाँ तक इस्लाम और यूनिफार्म सिविल कोड के संबंध की बात है तो यह एक प्रचलित भ्रम है कि यूसीसी भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह के हितों के विरुद्ध होगा, जबकि सच यह है कि यूनिफार्म सिविल कोड से सबसे अधिक लाभान्वित मुस्लिम महिलाएँ ही होंगी। यदि यूनिफार्म सिविल कोड लागू होता है तो वे तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी मध्यकालीन और अमानवीय प्रथाओं से मुक्ति पा सकती हैं।
  • ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) का कहना है कि तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी प्रथाएँ धार्मिक आस्था के विषय हैं, अतः सरकार इनमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
  • हालाँकि एआईएमपीएलबी कोई वैधानिक या संवैधानिक संस्था नहीं है फिर भी दशकों से वह मुस्लिम पर्सनल लॉ के मामले में प्रगतिवादी प्रयासों का विरोध करती आ रही है।

क्या समान नागरिक संहिता से केवल मुस्लिम नागरिक कानून में परिवर्तन होगा

  • यह धारणा गलत है कि कॉमन सिविल कोड केवल मुस्लिम नागरिक कानून में बदलाव लाएगी. कई बार महिला संगठनों ने यह बात हमारे सामने रखी है कि हर धर्म के अपने-अपने धर्म-कानूनों में एक समान बात है, और वह है– ये सभी कानून स्त्री के प्रति भेदभाव पर आधारित हैं।
  • उदाहरण के लिए, हिन्दू में जो उत्तराधिकार को लेकर कानून है वह पूरी तरह से नारी और पुरुष के बीच भेदभाव पर आधारित है । इसीलिए आज जब भी कोई समान नागरिक संहिता बनेगी, जो सम्पूर्ण रूप से आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष, पक्षपातरहित और प्रगतिशील होगी, तो हिन्दू नागरिक कानून में भी बदलाव आवश्यक होगा।
  • यह बदलाव “हिन्दू अविभाजित परिवार”  के उत्तराधिकार नियमों में भी लाना होगा. उसी तरह, मुस्लिम, ईसाई और अन्य व्यक्तिगत कानूनों में भी बदलाव आएगा।

निष्कर्ष

देखा जाए तो अगर भारतीय समाज सुधारक सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठा सके और उसका उन्मूलन करने में कामयाब हो सके तो, सिर्फ इसलिये कि उन्हें अपने धर्म के भीतर की कुरीतियों की फिक्र थी। भारत जैसे देश में संस्कृति की बहुलता होने से न केवल निजी कानूनों में बल्कि रहन-सहन से लेकर खान-पान तक में विविधता देखी जाती है और यही इस देश की खूबसूरती भी है। ऐसे में जरूरी है कि देश को समान कानून में पिरोने की पहल अधिकतम सर्वसम्मति की राह अपना कर की जाए। ऐसी कोशिशों से बचने की जरूरत है जो समाज को ध्रुवीकरण की राह पर ले जाएँ और सामाजिक सौहार्द्र के लिए चुनौती पैदा कर दें। दरअसल, भारतीय संविधान भारत में विधि के शासन की स्थापना की वकालत करता है। ऐसे में आपराधिक मामलों में जब सभी समुदाय के लिए एक कानून का पालन होता है, तब सिविल मामलों में अलग कानून पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

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