अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों पर कोविड महामारी का प्रभाव (Impact of COVID Pandemic on International relations )

लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के इंस्टिट्यूट ऑफ़ ग्लोबल अफ़ेयर्स की सोफिया गैस्टन ने बीबीसी से कहा था की, “इस महामारी के वक़्त तमाम देशों से ये उम्मीद थी कि वो इसे साझा चुनौती मान कर आपस में सहयोग करेंगे, ताकि इस संकट का मुक़ाबला कर सकें। पर, हो ये रहा है कि तमाम देश अपने निजी हितों को तरज़ीह दे रहे हैं और सहयोग के बजाय एक दूसरे से होड़ में लग गए हैं। ” इस वक्तव्य में काफी हद तक सच्चाई है।

31 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस को अंतरराष्ट्रीय आपदा घोषित किया था। चीन के वुहान शहर में  इसकी शुरुआत हुई थी। आज  यह पूरी दुनिआ में फ़ैल चूका है और विश्व दो बार इसकी मार झेल  चूका है। अब तक इस महामारी से लाखो लोग अपनी जान गवां चुके हैं। हलाकि इसके टीके का आविष्कार हो चूका है और टीकाकरण की प्रक्रिया समूचे विश्व में चल रही है। ऐसे में अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में हो रहे बदलाव को समझ पाना मुश्किल नहीं रह गया है।  

कोरोना महामारी के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो खबरें आ रही हैं, वे विश्‍व -राजनीति के बदलने की ओर इशारा कर रही हैं।

वैश्वीकरण विरोधी प्रवृत्तियां तेज़

कोविड -19 महामारी ने कुछ देशों में मौजूदा राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों और वैश्वीकरण विरोधी प्रवृत्तियों को तेज कर दिया है। कुछ विकसित देशों के लिए एक मजबूत आंतरिक वैश्वीकरण विरोध के लिए महामारी एक और हथियार बन गया है। वायरस राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं पहचानता है लेकिन इसकी क्षेत्रीय विशेषताएं हैं। महामारी ने इस तथ्य को उजागर कर दिया है कि उत्पादन आधार और उपभोक्ता बाजारों के बीच की दूरी जितनी अधिक होगी जोखिम उतना ही अधिक होगा।

रोजाना हजारों लोगों को शिकार बनाने के अलावा कोरोनावायरस संकट का सबसे स्पष्ट प्रभाव समूची दुनिया में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उथलपुथल के रूप में नजर आया। वायरस चुटकियों में पूरी दुनिया में फैल गया। यात्रियों ने विमान यात्राएं बंद कर दीं, दुनिया भर में पर्यटन थम गया और मनोरंजन जैसे संबंधित उद्योग भी कुछ हफ्तों में ही बंद हो गए। देश अपने आप में सिमट गए। उन्होंने अपनी सीमाएं बंद कर लीं और जनता के आवागमन पर ढेरों प्रतिबंध लगा दिए। वास्तव में कोरोना वायरस ने वैश्वीकरण को करारा झटका दिया है।

वैश्वीकरण, जिसका मुख्य उद्देश्य था विश्व व्यापार की तमाम भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अड़चनों को दूर कर दुनिया में  सामंजस्य स्थापित कर वैश्विक अर्थव्यवस्था में साधन संपन्न और साधन विहीन देशों के बीच में संतुलन स्थापित करना। परन्तु विभिन्न देश कोरोना वायरस के इस संकट के बीच अब एकाकी की तरफ बढ़ रहे है।  

वर्तमान वैश्विक राजनीति को देखते हुए लगता है कि आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था एक नए किस्म के व्यापार युद्ध का रूप ले सकती है और यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के ‘डी-ग्लोबलाइजेशन’ की मजबूत कड़ी साबित हो सकती है। यह अब स्पष्ट होता जा रहा है कि कोविड-19 दुनिया को एक नया आकार देने जा रहा है।  

संभव है कि यह घटना दुनिया में एक नए ग्लोबल ऑर्डर को स्थापित करेगी और चीन की नई भूमिका को भी स्पष्ट करेगी।  अभी वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक झटके में चीन को नकारना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है क्योंकि दुनिया के लगभग सारे देश चीन पर बहुत सी वस्तुओं के लिए पूरी तरह निर्भर करते हैं।  चीन दुनिया की उन वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जो पूंजी संपन्न भी है और श्रम संपन्न भी।  

यूरोपीय देशों की एकता में दरार एवं असहाय पश्चिम

कोरोना वायरस के चलते कूटनीतिक तनाव की एक मिसाल है यूरोपीय देशों की एकता में पड़ी दरार। जब इटली में कोविड-19 के संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़े, तो इटली ने अपने पड़ोसी देशों से अपील की कि वो मेडिकल संसाधन मुहैया कराने में उसकी मदद करें।  लेकिन, इटली के दो बड़े पड़ोसियों जर्मनी और फ्रांस ने अपने यहां से ऐसे उत्पादनों के निर्यात पर पाबंदी लगा दी। कोविड-19 प्रभावित देशों की मदद के लिए फंड जुटाने के प्रस्ताव पर भी यूरोपीय देश एकमत नहीं हैं। जर्मनी के अलावा नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया और फ़िनलैंड ने भी कोविड-19 प्रभावित देशों की मदद के लिए फंड जुटाने के इस प्रस्ताव का खुल कर विरोध किया था जबकि, स्पेन, फ्रांस, बेल्जियम, यूनान, आयरलैंड, पुर्तगाल, स्लोवेनिया और लक्ज़मबर्ग ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था।

अमेरिका के मुकाबले चीन में संक्रमण और मौत के बहुत कम मामले देखे गए। उनमें से कई देश संकट के समय चीन से मदद मांगने लगे। चीन ने संकट का फायदा उठाते हुए खुद को जरूरत के समय दुनिया का रक्षक बनाकर पेश किया। कई लोग इस बात से असहमत होंगे, लेकिन चीन का प्रचार तंत्र चीन की नरम छवि प्रचारित करने में लगा हुआ है।

चीन और अमेरिका के बीच गहराती खाई

अमेरिका ने पहले ही कोविड-19 को “चाइना वायरस” कहकर इस संकट की तोहमत चीन पर जड़ दी है। अमेरिका द्वारा चीन पर यह इल्जाम है कि वायरस के बारे में जानकारी होने के बाद भी उसने समूचे विश्व से इसे छिपाकर रखा। अमेरिका के इस आरोप का समर्थन भारत सहित विश्व के लगभग सभी देशों ने किया। चीन ने इन आरोपों का पुरजोर विरोध किया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वायरस पर चर्चा कराने के अमेरिकी प्रयास को चीन ने विफल कर दिया है। 

चीन द्वारा शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण की बोली

संकट के बीच दुनिया भर के बैंकों और कंपनियों में वित्तीय संपत्ति और हिस्सेदारी हासिल करने के चीन के इरादों की पर्याप्त रिपोर्टें हैं। पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना द्वारा भारत के एचडीएफसी में 1% हिस्सेदारी हासिल करने के बाद भारत हाल ही में इस खतरे के लिए सतर्क हो गया है।

इस बीच, दुनिया भर में, चीन के शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण की बोलियों के खिलाफ आवाजें तेज होती जा रही हैं। भारत के अलावा कई देशों, जैसे ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी ने अपने देशों में कंपनियों और वित्तीय संस्थानों में चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रतिबंधित करना शुरू कर दिया है। इन देशों ने अपनी महत्वपूर्ण संपत्तियों के संभावित चीनी शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण के अंतर्निहित खतरे को पहचाना है।

आरसीईपी और बेल्ट एंड रोड पहल का फायदा उठा रहा चीन

शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण को प्रतिबंधित करना चीन को मात देने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। यह क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) पर हावी होने की ओर अग्रसर है जो चीन को दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ, पूर्वी एशियाई देशों, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में बाजार पहुंच का फायदा उठाने में सक्षम बनाएगा। चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के साथ मिलकर चीन केंद्रित बहुपक्षीय वैश्वीकरण ढांचे के लिए रास्ता तैयार कर रहा है।

अमेरिका और यूरोप की घटती भूमिका

इस महामारी का भू-राजनीतिक नतीजा और भी गंभीर हो सकता है। एक अलग संभावना यह है कि कोविड -19 1940 के दशक के उत्तरार्ध से मौजूद मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को प्रभावी ढंग से प्रभावित करेगा। कोविड -19 ने राष्ट्र को तबाह करने के बाद आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर विश्व  में अमेरिका की भूमिका को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।  इस भू-राजनीतिक बदलाव का मुख्य लाभार्थी चीन हो सकता है जो एक ऐसा देश जो अंतरराष्ट्रीय आचरण के नियमों से खेलने में बिल्कुल विश्वास नहीं करता है।

कमजोर अंतरराष्ट्रीय सहयोग 

कोरोनावायरस संकट ने एक बार फिर बहुपक्षवाद की कमजोरियां उजागर कर दी हैं। इस संकट के दौर में अंतरराष्ट्रीय सहयोग अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है। ज्यादातर देश अपने ही भरोसे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तो संकट पर चर्चा ही नहीं कर सकी। विश्व स्वास्थ्य संगठन विवादों में घिरा है क्योंकि अमेरिका ने इसके महानिदेशक पर चीन के प्रति नरम रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। जी-20 देशों ने एकजुट होकर कुछ भी नहीं किया। विश्व व्यापार संगठन पिछले कई वर्षों से गहरे संकट में है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी आने के आईएमएफ के अनुमान से बुरी तरह घबराहट फैल गई है। लाखों नौकरियों पर तलवार लटकने के आईएलओ के अनुमानों से घबराहट और भी बढ़ गई है।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बातें हर कोई करता है, लेकिन अधिकतर बड़े देश ‘पहले मैं’ की नीति पर चलते हैं। कोरोना के बाद की दुनिया में राष्ट्रवाद या अतिराष्ट्रवाद बढ़ने की अपेक्षा की जा सकती है। क्षेत्रीय संगठन भी सक्रिय नहीं दिखे। इटली के प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी है कि संकट के समय यूरोपीय संघ की निष्क्रियता से यूरोपीय परियोजना खत्म हो सकती है। यूरोपीय संघ का 500 अरब यूरो का पैकेज बहुत देर में आया है और बहुत कम है।

दुनिया को नौकरियां बचाने, अर्थव्यवस्था के संकट में पड़े क्षेत्रों को बढ़ावा देने और सबसे गरीब तथा वंचित तबकों की आजीविका की समस्या हल करने के लिए वैश्विक योजना की जरूरत है। मगर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है। इसकी चर्चा तक नहीं हो रही है। कई देशों ने आपात ऋण के लिए आईएमएफ से गुहार लगाई है। यह संकट कई देशों की अर्थव्यवस्था का भट्ठा बिठा देगा। इससे व्यापक अशांति और अस्थिरता फैल सकती है।

विश्व संस्थानों की घटती विश्वसनीयता और सुरक्षा को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता

अमेरिका ने अफगान युद्ध, इराक युद्ध, 11 सितंबर और खाड़ी युद्ध में हुए नुकसान से अधिक नुकसान कोरोनावायरस के कारण उठाया है। वह सुरक्षा पर हर वर्ष सैकड़ों अरब डॉलर खर्च करता है मगर उसका स्वास्थ्य तंत्र सबसे ख़राब साबित है। वायरस ने दिखाया है कि स्वास्थ्य सुरक्षा अहम है बल्कि पारंपरिक सैन्य सुरक्षा से भी अधिक अहम है। कोरोनावायरस के कारण जैव आतंकवाद पर फिर चर्चा होने लगी है। महामारी के दौरान यह स्पष्ट होने लगा है की वैश्विक संस्थागत ढांचे अपने चरित्र में अलोकतांत्रिक और गैर-प्रतिनिधित्व वाले हैं, इसके एजेंडे को बड़े पैमाने पर मानवता की सेवा के लिए नहीं बनाया गया है।

वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला

बेहद करीब से जुड़ी दुनिया में विनिर्माण लंबी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर करता था, उनमें से अधिकतर श्रृंखलाएं चीन से होकर आती थीं। चीन से गुजरने वाली लंबी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अब निश्चित रूप से विचार करना होगा। अब छोटी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर जोर होगा। देश कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होने की कोशिश करेंगे। स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण तथा छोटे एवं मझोले उद्योग आदि पर अधिक ध्यान दिया जाएगा। कार्यस्थलों में तब्दीली होंगी, जहां दूर से काम करने को बढ़ावा दिया जाएगा। नए तौर-तरीके शुरू होंगे। आपूर्ति की नई प्रणालियां ईजाद की जाएंगी। शिक्षा एवं स्वास्थ्य आपूर्ति प्रणालियों में क्रांति होगी। यात्रा और परिवहन में आमूल-चूल बदलाव आएगा। दैहिक दूरी यानी सोशल डिस्टेंसिंग सुनने में अच्छा लगती है मगर मनुष्य पर इसका मनोवैज्ञानिक असर पड़ेगा क्योंकि वह मूलतः सामाजिक प्राणी है। व्यवहार में इतना बड़ा परिवर्तन आसानी से नहीं होगा और उसके परिणाम भी होंगे।

चीन पर नजर और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घट रही इन तमाम घटनाओं के बीच जो स्थिति बहुत स्पष्ट हो रही है कि जैसे-जैसे यह महामारी वैश्विक स्तर पर गहराती जाएगी,  ठीक उसी के साथ चीन इस पूरी समस्या का सबसे पेचीदा केंद्रीय विमर्श का मुद्दा बनता जाएगा।  एक वक्त से ही दुनिया के तमाम मुल्क चीन की गतिविधियों को संदेहास्पद नजर से देखते आए हैं और इसके पीछे कुछ ठोस कारण भी मौजूद रहे हैं।  चाहे वह मसला ‘उइगर मुसलमानों’ के मानवाधिकार हनन का हो या फिर कोरोना वायरस जैसी गंभीर चुनौती को शुरुआती दौर में दुनिया के अन्य मुल्कों से छिपाने का हो।  चीन ने पिछले दो दशकों में वैश्विक नियमों का दुरुपयोग करके व्यापारिक फायदे भी अपने पक्ष में रखकर डब्ल्यूटीओ के कई मानकों का उल्लंघन किया है। 

अगर एक और उदाहरण पर नजर डालें तो हाल ही में चीन की आलोचना दुनिया के कुछ चुनिंदा देशों ने संकट से निपटने के नाम पर भेजी गई खराब गुणवत्ता वाली चिकित्सीय संसाधनों को लेकर की है।  संकट की घड़ी में इस तरीके के उदाहरणों ने चीन की विश्वसनीयता पर और प्रश्न लगा दिया है।  हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन के एक थिंकटैंक ने चीन पर कोरोना महामारी के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा करने का आग्रह किया है।  अगर ऐसा होता है तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन के विकेंद्रीकरण की शुरुआत हो सकती है। 

कोविड महामारी के दौरान भारत की अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति

महामारी संकट फैलने के साथ कई अन्य देशों के विपरीत भारत ने वास्तव में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का रास्ता अपनाया है। संकट के बीच ठप पड़े दक्षेस को फिर सक्रिय करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास की किसी को अपेक्षा नहीं थी। प्रधानमंत्री ने विश्व नेताओं के साथ टेलीफोन पर बातचीत भी की, जिसमें सभी नेताओं ने संकट से निपटने के भारत के प्रयासों की सराहना की और उसका सहयोग भी मांगा। नतीजतन भारत का औषधि क्षेत्र हाइड्रो-क्लोरोक्वीन की गोलियां बनाने तथा पूरी दुनिया को मुहैया कराने के लिए तैयार हो गया है। इस दवा की अमेरिका समेत तमाम देशों से मांग आ रही है। वैक्सीन तैयार होने के पश्चात् भारत ने अपनी वैक्सीन कूटनीति के द्वारा भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है तथा पड़ोसी देशों के साथ अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों को वैक्सीन मुहैय्या कराया है। भू-राजनीतिक विचार और शक्ति की राजनीति अहम बनी रहेगी मगर भारत को वसुधैव कुटुंबकम, करुणा, टकराव खत्म करने, प्रकृति का सम्मान करने एवं पर्यावरण का ध्यान रखने जैसे विषयों पर आधारित नई विश्व व्यवस्था तैयार करने में मदद करनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के 75वें वर्ष में इन विषयों को सामने रखना चाहिए और उन पर चर्चा होनी चाहिए।

‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’ वैक्सीन तक सबकी पहुंच की राह में बाधा 

जब कोई देश सिर्फ अपने नागरिकों या अपने यहां रहने वाले लोगों के लिए वैक्सीन डोज सुरक्षित करने की कोशिश करता है तो इसे ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’ नाम दिया जाता है। ऐसी स्थिति तब होती है जब कोई देश वैक्सीन को अन्य देशों में उपलब्ध होने से पहले ही उन्हें अपने घरेलू बाजार और अपने नागरिकों के लिए एक तरह से रिजर्व करने की कोशिश करता है। इसके लिए संबंधित देश की सरकार वैक्सीन मैन्यूफैक्चरर के साथ प्री-परचेज अग्रीमेंट कर लेती है।

अमेरिका, ब्रिटेन, जापान फ्रांस, जर्मनी जैसे अमीर देश वैक्सीन मैन्यूफैक्चरर्स के साथ प्री-परचेज अग्रीमेंट कर चुके हैं। जापान, अमेरिका, ब्रिटेन और ईयू ने सबसे पहले अपने यहां वैक्सीन को सुनिश्चित करने के लिए अरबों रुपये खर्च कर डाले हैं। इन देशों ने कोरोना वैक्सीन बनाने के करीब पहुंचीं फाइजर इंक, जॉनसन ऐंड जॉनसन और एस्ट्रा जेनेका जैसी कंपनियों के साथ अरबों रुपये का करार कर लिया है। हालांकि, इन कंपनियों की वैक्सीन कितनी कारगर होगी, अभी यह भी साफ नहीं हो पाया है।

ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि इस तरह के प्री-परचेज अग्रीमेंट्स से कोरोना की वैक्सीन सबकी पहुंच से बाहर हो सकती है। मोटे तौर पर दुनिया की आबादी 800 करोड़ के करीब है, जिसमें सभी तक वैक्सीन पहुंचाना तो अपने आप में टेढ़ी खीर है। ऊपर से इस तरह के अडवांस अग्रीमेंट कोरोना की वैक्सीन को गरीब देशों की पहुंच से दूर कर देंगे। इनकी कीमत इतनी ज्यादा हो जाएगी कि सभी इन्हें अफोर्ड भी नहीं कर पाएंगे।

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