वैक्सीन मैत्री की कूटनीति : भारत (वैक्सीन डिप्लोमेसी ऑफ़ इंडिया)

कोरोना महामारी के काल में “वैक्सीन कूटनीति” एक चर्चित शब्द के रूप में उभरा है। वास्तव में विश्व स्तर पर कई वैक्सीन बनाये गए हैं क्योंकि संक्रमण को रोकने का एकमात्र उपाय वैक्सीन ही है।  परन्तु वैक्सीन तक सभी देशों की सामान पहुंच नहीं है , खासकर गरीब देशों की।  

ऐसी परिस्थिति में वैक्सीन की आपूर्ति द्वारा अन्य देशों की सहायता कर उनसे मित्रता कायम करना और विश्व राजनीती में अपनी स्थिति मजबूत करना ही वैक्सीन कूटनीति है।   वास्तव में यह स्वास्थ्य कूटनीति का ही एक रूप है जिसका प्रचलन महामारी काल अनतर्राष्ट्र्य राजनीती पर हावी होता  दिख रहा है।

भारत अपनी विशाल आबादी का टीकाकरण करने की चुनौतियों से जूझ रहा है, परन्तु इसने वैश्विक वैक्सीन उत्पादन और आपूर्ति प्रयासों का समर्थन करने के अपने प्रयासों के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा प्राप्त की है।

जनवरी 2021 में, भारत ने वैक्सीन मैत्री (वैक्सीन फ्रेंडशिप) पहल शुरू की।  इसने वैश्विक स्तर पर कम आय वाले और विकासशील देशों को भारत में बने टीकों का  उपहार स्वरुप आपूर्ति करने का एक प्रमुख कूटनीतिक प्रयास। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े फार्मास्यूटिकल्स उत्पादक के रूप में, भारत कोविड 19 टीकों के उत्पादन की दौड़ में एक गंभीर दावेदार है। भारत का फार्मास्युटिकल पावरहाउस विश्व स्तर पर जेनेरिक दवाएं प्रदान करता है और दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत टीकों का उत्पादन करता है, जिसमें डिप्थीरिया, पर्टुसिस, टेटनस (डीपीटी), तपेदिक और खसरा के टीके शामिल हैं। 

भारत का सीरम इंस्टीट्यूट – मात्रा के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन उत्पादक है। यह  कोविशील्ड वैक्सीन (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी – एस्ट्राजेनेका द्वारा विकसित) का उत्पादन कर रहा है और भारत का भारत बायोटेक कोवैक्सिन का उत्पादन कर रहा है। कई अन्य मेड-इन-इंडिया वैक्सीन उम्मीदवार विकास के विभिन्न चरणों में हैं, जिनमें संभावित गेम-चेंजिंग नेज़ल वैक्सीन और रूस का स्पुतनिक वी वैक्सीन (वर्तमान में डॉ रेड्डीज लेबोरेटरी के नेतृत्व में भारत में चरण 3 के परीक्षण) शामिल हैं।

भारतीय वैक्सीन की मांग ही क्यों ?

कम आय वाले और विकासशील बाजारों के लिए मेड-इन-इंडिया दवाएं सस्ती हैं। उत्तरी गोलार्ध के देशों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले फाइजर-बायोएनटेक और मॉडर्न के टीकों की कीमत क्रमशः यूएस $ 19 और यूएस $ 32-37 प्रति खुराक है। भारत में, जबकि टीके अभी तक निजी बाजार में नहीं हैं और वैक्सीन निर्माता सरकार को रियायती दरों पर खुराक की आपूर्ति कर रहे हैं, फिर भी वे काफी सस्ते हैं। भारत का सीरम संस्थान कथित तौर पर कोविशील्ड की कीमत 13 अमेरिकी डॉलर प्रति खुराक व्यावसायिक रूप से देगा।

सस्ता होने के अलावा, भारत में बने टीके कमजोर बुनियादी सुविधाओं वाले देशों के लिए अधिक उपयुक्त हैं। फाइजर और मॉडर्न दोनों टीकों को उप-शून्य तापमान पर संग्रहित किया जाना चाहिए, जबकि भारतीय निर्मित दोनों टीकों को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस – रेफ्रिजरेटर तापमान पर संग्रहीत किया जा सकता है। भारत में बड़े पैमाने पर टीकाकरण कार्यक्रमों को साझा करने के लिए महत्वपूर्ण क्षमताएं और विशेषज्ञता भी है और कई देशों में इसके वैक्सीन रोलआउट का बारीकी से पालन किया जा रहा है।

भारत द्वारा किन देशों को वैक्सीन आपूर्ति की गई ?

22 मार्च 2021 तक, भारत ने विभिन्न तौर-तरीकों के माध्यम से 76 देशों को 60.4 मिलियन वैक्सीन खुराक की आपूर्ति की है, जिसमें सहायता अनुदान, उपहार, व्यावसायिक रूप से और विश्व स्वास्थ्य संगठन  – गावी  के कोवैक्सीन गठबंधन के प्रावधान सम्बन्धी बाध्यता शामिल हैं। मालदीव, भूटान, बांग्लादेश और नेपाल, म्याँमार और सेशेल्स, श्रीलंका, अफगानिस्तान और मॉरीशस भारत द्वारा वैक्सीन आपूर्ति की गई है।  वास्तव में भारत ने दक्षिण एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और कैरीबियाई देशों को टीकों की आपूर्ति की है और जल्द ही दक्षिण पूर्व एशिया और प्रशांत क्षेत्र में आपूर्ति करेगा। यूके और कनाडा ने भी भारत के सीरम इंस्टीट्यूट के साथ व्यावसायिक ऑर्डर दिए हैं क्योंकि वे अपने टीकाकरण प्रयासों को जारी रखते हैं।

वैक्सीन राष्ट्रवाद और भारत

भारत की वैक्सीन कूटनीति ऐसे समय में आई है जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’ और वैक्सीन आपूर्ति के बारे में बढ़ती असमानता पर चिंता जता रहा है। डब्ल्यूएचओ ने कई विकसित देशों को टीकों की जमाखोरी के लिए बुलाया है, जो मध्यम और निम्न आय वाले देशों के चिंता का कारण है। जैसे-जैसे देश आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए हाथापाई करते हैं, कई लोग पहुंच और उपलब्धता के अंतराल को कम करने के लिए भारत की ओर रुख कर रहे हैं। भारत विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए वैक्सीन विकास और आपूर्ति के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के प्रयासों में सबसे आगे है। भारत और दक्षिण अफ्रीका ने महामारी की अवधि के लिए या जब तक अधिकांश देश अपनी आबादी का टीकाकरण नहीं कर लेते हैं , तब तक कोविड -19 टीकों के पेटेंट और  बौद्धिक संपदा छूट के लिए विश्व व्यापार संगठन में आवेदन किया है। हलाकि इस दिशा में अबतक कुछ सफलता प्राप्त नहीं हो पायी है।  

महामारी के शुरुआती दिनों से, भारत वैश्विक पुनर्प्राप्ति प्रयासों का समर्थन करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता के बारे में मुखर रहा है और दक्षिण एशिया, अफ्रीका और इंडो-पैसिफिक के देशों को भोजन, दवाएं और आवश्यक आपूर्ति प्रदान करने वाले पहले देशों में से एक था। सितंबर 2020 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में, प्रधान मंत्री मोदी ने भारत के वैक्सीन उत्पादन और वितरण क्षमता को “मानवता” के लिए उपलब्ध कराने के लिए भारत की प्रतिबद्धता व्यक्त की क्योंकि यह वायरस का मुकाबला करता है। भारतीय विदेश नीति का एक मूलभूत सिद्धांत है – वासुदेव कटुम्बकम या “एक परिवार के रूप में दुनिया”।

शब्दार्थ और परोपकारिता से परे, भारत की वैक्सीन कूटनीति भारतीय सॉफ्ट-पावर और प्रभाव के एक प्रभावी उपकरण और साधन के रूप में कार्य करती है, जो भारत के पड़ोस और इंडो-पैसिफिक में संबंधों को मजबूत करने और गहरा करने की सेवा करती है।

भारत की वैक्सीन कूटनीति के परिणाम

पीएम मोदी को वैश्विक नेताओं का मिला समर्थन

कोरोना संकट ने कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कमिओं को उजागर किया है।  इनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद उनमे से एक है। इस वैश्विक आपदा से जुड़ा   एक भी प्रस्ताव यह संस्था तक पारित नहीं कर सकी।  विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस दौरान निष्पक्ष नहीं दिखा और न ही कोई उचित मार्गदर्शन कर सका।  अन्य वैश्विक संस्थाएं भी इस महामारी से बचाव के लिए कुछ खास पहल नहीं कर सकी। इसे ही ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने संबोधन में इन संस्थाओं में सुधार के लिए ज़ोरदार पैरवी की थी।  उनकी दलीलों को कई वैश्विक नेताओं का समर्थन मिला। 

कोरोना काल में भारत की एक अलग छवि 

कोरोना संकट काल में भारत अपनी एक अलग छवि तैयार हुई है। इतनी  बड़ी जनसँख्या वाला देश होने के बावजूद भारत ने बेहतर कोविड प्रबंधन के रूप में एक मिसाल कायम की है।  हालांकि आर्थिक मोर्चे पर इस प्रबंधन की कुछ तात्कालिक कीमत चुकानी पड़ी, लेकिन अब उसमें तेजी से सुधार हो रहा है।  भारत न केवल काफी हद तक खुद को सुरक्षित रखा , बल्कि उसने पड़ोसियों का ध्यान रखने के लिए निष्क्रिय पड़े दक्षेस जैसे संगठन को पुन: सक्रिय करने का प्रयास किया। 

वैक्सीन, मास्क आदि वस्तुओं के उत्पादन में भारत आत्मनिर्भर  

 कोरोना संकट के शुरू होने के समय  मास्क, पीपीई किट और अन्य वस्तुओं के उत्पादन में भारत की स्थिति संतोषजनक नहीं थी, लेकिन इसी संकट के दौरान भारत ने इन वस्तुओं के उत्पादन में काफी प्रगति हासिल कर दुनिया को अपनी क्षमताओं से अवगत कराया।  इस वैश्विक संकट के दौरान भारत स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों के अग्रणी आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा। आज समस्त विश्व  में भारत की वैक्सीन कूटनीति का बोलबाला है, जबकि चीन के ऐसे ही प्रयास कुछ ख़ास असर नहीं कर पा रहे हैं। अफ्रीका के गुमनाम देशों से लेकर कैरेबियाई देश सेंट लूसिया तक भारत की वैक्सीन भेजी जा रही है।  टीके की आपूर्ति में पड़ोसी देशों का प्राथमिकता (नेवरहुड  फर्स्ट) के आधार पर ध्यान रखा गया है। कोरोना संकट काल में वैश्विक परिदृश्य पर भारत के ऐसे उभार का श्रेय नि:संदेह देश के राजनीतिक नेतृत्व को जाता है।  उसने दर्शाया कि भारत के पास भले ही संसाधनों की कमी हो, लेकिन इच्छाशक्ति की नहीं। 

भारत के इन्हीं समन्वित प्रयासों का ही परिणाम है कि दुनिया भर में उसके प्रति सम्मान बढ़ा है। ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रधान ट्रेडोस घ्रेब्रेयसस तक भारत की क्षमता के कायल हैं। सीमा पर भारत के लिए सिरदर्द बढ़ाने वाले चीन और पाकिस्तान जैसे देशों का भारत के प्रति रवैया कुछ नरम होने के पीछे इन पहलुओं को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। 

भविष्य में भू-राजनीतिक, भू-आर्थिक मोर्चों पर भारत का वर्चस्व

चीन को आशंका सता रही थी कि यदि उसने भारत के साथ तनातनी बढ़ाई तो दुनिया उसके पक्ष में लामबंद हो सकती है। इसी कारण पाकिस्तान भी संघर्ष विराम की पेशकश करता दिखा। भविष्य में भू-राजनीतिक, भू-आर्थिक और भू-सामरिक मोर्चों पर भारत का वर्चस्व बढ़ेगा।  वैश्विक गवर्नेंस ढांचे में भी उसकी भूमिका बढ़ेगी। वास्तव में यह भारतीय विदेश नीति और वैश्विक ढांचे के लिए एक निर्णायक पड़ाव है।  भारतीय नेतृत्व को इस स्थिति का पूरा लाभ उठाना चाहिए। 

भारत की विश्वव्यापी छवि ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’

भारत की विश्वव्यापी छवि ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ अर्थात दुनिया का दवाखाना के रूप में मज़बूत हुई है।  भारत जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक है।  वैश्विक दवा उत्पादन का 20 प्रतिशत यहीं होता है और दुनिया में टीके की 62 प्रतिशत मांग की पूर्ति यहीं से होती है।  भारत ने वैश्विक स्वास्थ्य और अंतरराष्ट्रीय संबंधों, दोनों को बेहतर बनाने के लिए अपने ढंग से पहल की है। किसी मामले में पहली बार ऐसा हो रहा है, जब भारतीय नीति का ध्यान दक्षिण एशिया और हिंद महासागर के देशों पर है।  ज़ाहिर है, इस क्षेत्र का अहम सैन्य महत्व है।  इसके अलावा महामारी के शुरुआती दिनों में भारत ने जिस तरह दवाओं का निर्यात किया, उससे भी देश की विश्वसनीयता में इज़ाफा हुआ और अब टीके के लिए अनेक देश भारत से उम्मीद लगाए हुए हैं।  कई देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध मज़बूत हुए हैं।  

वैश्विक नेतृत्व की भूमिका का अनूठा अवसर

वर्तमान गंभीर स्वास्थ्य संकट के समय में भारत का यह कदम न केवल उसे वैश्विक नेतृत्व की भूमिका का अनूठा अवसर देता है, बल्कि दुनिया में बीजिंग की आक्रामक मुद्र्रा का प्रभावशाली जवाब भी देता है. 

वर्तमान गंभीर स्वास्थ्य संकट के समय में भारत का यह कदम न केवल उसे वैश्विक नेतृत्व की भूमिका का अनूठा अवसर देता है, बल्कि दुनिया में बीजिंग की आक्रामक मुद्रा  का प्रभावशाली जवाब भी देता है।  भू-राजनीतिक विचारों को एक तरफ रखते हुए यह समझना अनिवार्य है कि वैक्सीन कूटनीति रणनीतिक रूप से भारत के एक जिम्मेदार वैश्विक नेता के रूप उभरने का मौका है।  फिर भी, अभी चीन को सबसे बड़ा फायदा यह है कि वह महामारी को नियंत्रित करने में सक्षम है और उसकी अर्थव्यवस्था भी बहुत हद तक पटरी पर है।  दूसरी ओर, भारतीय अर्थव्यवस्था को संभलने में अभी वक्त लगेगा और यहां घरेलू स्वास्थ्य मुद्दे अभी भी हावी हैं।  मतलब, कूटनीतिक बढ़त के साथ आर्थिक सुधार भी ज़रूरी है ।

वैक्सीन कूटनीति की सीमायें 

भले ही भारत की वैक्सीन कूटनीति के फायदे कई हों परन्तु इसकी कुछ सीमायें भी अस्पष्ट हैं जो वर्तमान सरकार की आलोचना का कारण बन गई हैं। संभवतः भारत वैक्सीन राष्ट्रवाद के मामले में कुछ पीछे हुआ जान पड़ता है। 

यह अपने स्वयं के नागरिकों या निवासियों के लिये वैक्सीन की खुराक को सुरक्षित करने में और अन्य देशों को वैक्सीन देने से पूर्व अपने घरेलू बाज़ारों को प्राथमिकता देने में चूक सा गया है।

यही कारण है की भारत में वैक्सीन की कमी को लेकर सरकार का विरोध हो रहा है बल्कि कई राज्यों में वैक्सीन के अभाव की समस्या भी देखने को मिल रही है इससे भारत में सहकारी संघवाद की संकल्पना में बढ़ा उत्पन्न होती दिख रही है।

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