कोर्बेवैक्स (Corbevax) वैक्सीन: भारत में दूर करेगी कोविड टीकों की कमी

Corbevax वैक्सीन: भारत में दूर करेगी कोविड टीकों की कमी

  • भारत सरकार ने हैदराबाद स्थित कंपनी बायोलॉजिकल ई (Biological E) से कोविड-19 की एक नई वैक्सीन, ‘कोर्बेवैक्स’ (Corbevax) की 300 मिलियन खुराक खरीदने के लिए अग्रिम आदेश दिया है।
  • कोर्बेवैक्स एक ‘रिकॉम्बिनैंट प्रोटीन सब-यूनिट’ (recombinant protein sub-unit) वैक्सीन है। इसका मतलब यह है कि इस टीका का निर्माण सार्स-सीओवी-2 (SARS-CoV-2) वायरस के सतह पर मौजूद स्पाइक प्रोटीन (spike protein) से किया गया है।
  • उल्लेखनीय है कि यह स्पाइक प्रोटीन ही है जो कोरोनावायरस को शरीर में कोशिकाओं (सेल) में प्रवेश करने की अनुमति देता है ताकि यह रेप्लिकेट कर सके और कोविड-19 बीमारी का कारण बन सके।
  • परंतु जब शरीर में केवल स्पाइक प्रोटीन प्रवेश कराया जाता है, तो इसके हानिकारक होने की उम्मीद नहीं होती है क्योंकि इसमें शेष वायरस उपस्थित नहीं होता है।
  • वैक्सीन इंजेक्शन स्पाइक प्रोटीन के खीलाफ शरीर में इम्यून रिस्पॉन्स विकसित करता है।
  • सीधे शब्दों में कहें तो जब असली कोरोनावायरस शरीर को संक्रमित करने का प्रयास करता है, तो उसके पास पहले से ही एक इम्यून रिस्पॉन्स तैयार होगी जिससे व्यक्ति के गंभीर रूप से बीमार पड़ने की संभावना नहीं होगी।
  • कोर्बेवैक्स बनाने के लिए उपर्युक्त जिस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है उसका इस्तेमाल पूर्व में हेपेटाइटिस बी टीका के निर्माण के लिए किया जा चुका है। परंतु पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल कोविड-19 टीका विकास के लिए किया जा रहा है। वैसे नोवावैक्स भी प्रोटीन आधारित टीका है परंतु इसे अभी इमरजेंसी उपयोग की अनुमति प्राप्त नहीं हुयी है।

कोर्बेवैक्स निर्माण विधि

  • हालांकि इस टीका को देश में ही उत्पादित किया जा रहा है परंतु कोर्बेवैक्स की शुरुआत का पता बायलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के नेशनल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन से लगाया जा सकता है।
  • स्कूल एक दशक से कोरोनावायरस और MERS (Middle East respiratory syndrome coronavirus) के लिए रिकॉम्बिनैंट प्रोटीन टीकों पर काम कर रहा था।
  • जब फरवरी 2020 में सार्स-सीओवी-2 के लिए आनुवंशिक अनुक्रम (जेनेटिक सीक्वेंस) उपलब्ध कराया गया, तो स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने स्पाइक प्रोटीन के लिए जीन के लिए अनुक्रम निकाला, और इसकी क्लोनिंग और इंजीनियरिंग पर काम किया। इसके बाद जीन को यीस्ट में डाल दिया गया, ताकि वह प्रोटीन की प्रतियां बना सके और जारी कर सके।
  • शोध से जुड़े वैज्ञानिक के मुताबिक यह वास्तव में बीयर के उत्पादन के समान है। शराब उत्पादित करने के बजाय, इस मामले में, यीस्ट रिकॉम्बिनैंट प्रोटीन जारी उत्पादित कर रहा था। 
  • इसके पश्चात, प्रोटीन को शुद्ध किया गया ताकि यीस्ट (खमीर) को कोई भी अवशेष नहीं रह जाये। इस तरह इसे पूर्णतः ‘प्रिस्टेन’ यानी मूल प्रकृति का रूप दिया गया। फिर, इम्यून रिस्पॉन्स को बेहतर ढंग से उत्प्रेरित करने के लिए एक सह-औषधि का उपयोग करके टीका तैयार किया गया।
  • टीके की अधिकांश सामग्रियां सस्ती और आसानी से मिल जाने वाली हैं।
  • अगस्त 2020 में बायलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन ने इस वैक्सीन के लिए अपने प्रोडक्शन सेल बैंक को बायोलॉजिकल-ई को ट्रांसफर कर दिया, ताकि हैदराबाद की कंपनी ट्रायल के जरिए कैंडिडेट को ले जा सके।
  • वैक्सीन को तीसरे चरण के परीक्षणों के लिए मंजूरी मिल गई है, और सरकार का उम्मीद है कियह परीक्षण जुलाई तक खत्म हो जाएगी।

अन्य टीकाओं से कोर्बेवैक्स भिन्न कैसे?

  • अब तक कोविड-19 के खिलाफ प्रतिरक्षा हेतु जिन भी टीकाओं को मंजूरी दी गईं हैं वे या तो एमआरएनए (mRNA) टीकाएं हैं जैसे कि फाइजर और मॉडर्ना की टीकाएं, या फिर वायरल वेक्टर वैक्सीन हैं (एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड / कोविशील्ड, जॉनसन एंड जॉनसन और स्पुतनिक वी) या निष्क्रिय वायरस टीके (कोवैक्सिन, सिनोवैक-कोरोनावैक और सिनोफार्म की सासर्व-सीओवी2-वेरो सेल) हैं। 
  • निष्क्रिय टीके, जिसमें पूरे सार्स-सीओव-2 वायरस के मारे गए कण शामिल हैं, वायरस की पूरी संरचना को लक्षित करने का प्रयास करती हैं। दूसरी ओर, कोर्बेवैक्स, एमआरएनए एवं  वायरल वेक्टर कोविड-19 टीकों की तरह, केवल स्पाइक प्रोटीन को लक्षित करता है, लेकिन  अलग तरीके से।
  • वायरल वेक्टर और एमआरएनए और टीके स्पाइक प्रोटीन बनाने के लिए हमारी कोशिकाओं को उत्प्रेरित करने के लिए एक कोड का उपयोग करते हैं जिसके खिलाफ शरीर को प्रतिरक्षा का निर्माण करना होता है।
  • अधिकांश अन्य कोविड-19 टीकों की तरह, कॉर्बेवैक्स की दो खिराक दी जानी हैं। हालांकि, चूंकि इसे कम लागत वाले प्लेटफॉर्म का उपयोग करके बनाया गया है, इसलिए यह देश में उपलब्ध सबसे सस्ती टीकों में से एक होने की भी उम्मीद है।

कोर्बेवैक्स-भारत के लिए महत्वपूर्ण कैसे?

  • यह पहली बार है जब भारत सरकार ने एक ऐसी वैक्सीन की खरीद के लिए  आदेश दिया है जिसे आपातकालीन उपयोग प्राधिकरण (ईयूए) प्राप्त नहीं हुआ है।
  • भारत सरकार ने इसके लिए  1,500 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया है जो 15 करोड़ भारतीय नागरिकों की टीकाकरण सुनिश्चित कर सकती है।
  • केंद्र सरकार ने वैक्सीन के विकास के लिए प्रमुख प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षण सहायता प्रदान की है, जिसमें जैव प्रौद्योगिकी विभाग से 100 करोड़ रुपये की सहायता अनुदान भी शामिल है।
  • भारत द्वारा इतना बड़ा ऑर्डर देने की एक बड़ी वजह वैक्सीन की आपूर्ति बढ़ाने में हो रही मुश्किलें हैं। जहां अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने फाइजर, एस्ट्राजेनेका और मॉडर्ना जैसी टीकों के लिए अग्रिम भुगतान और जोखिम वाले निवेश किए थे, वहीं भारत सरकार ने सीमित ऑर्डर देने से पहले अपनी दो स्वदेशी टीकों को मंजूरी मिलने तक इंतजार किया।
  • सरकार द्वारा विदेशी टीकों के लिए नियामक आवश्यकताओं में ढील दिए जाने के बाद भी, उसे फाइजर और मॉडर्ना जैसी कंपनियों से तुरंत जवाब नहीं मिला। इसका कारण है कि उनकी आपूर्ति पहले से ही अन्य देशों द्वारा दिये गये ऑर्डर के खिलाफ की जा रही है।
  • भारत वर्तमान में फाइजर के टीके की सीमित आपूर्ति के लिए बातचीत कर रहा है, और इस साल दिसंबर तक कोविड के टीकों की दो बिलियन खुराक तक सुरक्षित होने की उम्मीद कर रहा है। जिस आसानी से इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है, उसे देखते हुए, कॉर्बेवैक्स इस अपेक्षित आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा बना सकता है और दिसंबर 2021 तक देश के सभी नागरिकों का टीकाकरण करने का लक्ष्य पूरा किया जा सकता है।

बायोलॉजिकल-ई के बारे में

  • बायोलॉजिकल-ई, जिसका मुख्यालय हैदराबाद में है, की स्थापना डॉ डी. वी. के. राजू ने 1953 में एक जैविक उत्पाद कंपनी के रूप में की थी जिसने भारत में हेपरिन (heparin) के उत्पादन का बीड़ा उठाया था।
  • 1962 तक, इसने बड़े पैमाने पर डीपीटी (DPT) टीकों का उत्पादन करते हुए, टीकों के क्षेत्र में प्रवेश किया। आज, यह भारत में प्रमुख टीका निर्माताओं में से एक है और और खुद को दुनिया में टेटनस टीका का सबसे बड़ा उत्पादक मानती है।
  • भारत सरकार ने हैदराबाद स्थित कंपनी बायोलॉजिकल ई (Biological E) से कोविड-19 की एक नई वैक्सीन, ‘कोर्बेवैक्स’ (Corbevax) की 300 मिलियन खुराक खरीदने के लिए अग्रिम आदेश दिया है।
  • कोर्बेवैक्स एक ‘रिकॉम्बिनैंट प्रोटीन सब-यूनिट’ (recombinant protein sub-unit) वैक्सीन है। इसका मतलब यह है कि इस टीका का निर्माण सार्स-सीओवी-2 (SARS-CoV-2) वायरस के सतह पर मौजूद स्पाइक प्रोटीन (spike protein) से किया गया है।
  • उल्लेखनीय है कि यह स्पाइक प्रोटीन ही है जो कोरोनावायरस को शरीर में कोशिकाओं (सेल) में प्रवेश करने की अनुमति देता है ताकि यह रेप्लिकेट कर सके और कोविड-19 बीमारी का कारण बन सके।
  • परंतु जब शरीर में केवल स्पाइक प्रोटीन प्रवेश कराया जाता है, तो इसके हानिकारक होने की उम्मीद नहीं होती है क्योंकि इसमें शेष वायरस उपस्थित नहीं होता है।
  • वैक्सीन इंजेक्शन स्पाइक प्रोटीन के खीलाफ शरीर में इम्यून रिस्पॉन्स विकसित करता है।
  • सीधे शब्दों में कहें तो जब असली कोरोनावायरस शरीर को संक्रमित करने का प्रयास करता है, तो उसके पास पहले से ही एक इम्यून रिस्पॉन्स तैयार होगी जिससे व्यक्ति के गंभीर रूप से बीमार पड़ने की संभावना नहीं होगी।
  • कोर्बेवैक्स बनाने के लिए उपर्युक्त जिस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है उसका इस्तेमाल पूर्व में हेपेटाइटिस बी टीका के निर्माण के लिए किया जा चुका है। परंतु पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल कोविड-19 टीका विकास के लिए किया जा रहा है। वैसे नोवावैक्स भी प्रोटीन आधारित टीका है परंतु इसे अभी इमरजेंसी उपयोग की अनुमति प्राप्त नहीं हुयी है।

कोर्बेवैक्स निर्माण विधि

  • हालांकि इस टीका को देश में ही उत्पादित किया जा रहा है परंतु कोर्बेवैक्स की शुरुआत का पता बायलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के नेशनल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन से लगाया जा सकता है।
  • स्कूल एक दशक से कोरोनावायरस और MERS (Middle East respiratory syndrome coronavirus) के लिए रिकॉम्बिनैंट प्रोटीन टीकों पर काम कर रहा था।
  • जब फरवरी 2020 में सार्स-सीओवी-2 के लिए आनुवंशिक अनुक्रम (जेनेटिक सीक्वेंस) उपलब्ध कराया गया, तो स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने स्पाइक प्रोटीन के लिए जीन के लिए अनुक्रम निकाला, और इसकी क्लोनिंग और इंजीनियरिंग पर काम किया। इसके बाद जीन को यीस्ट में डाल दिया गया, ताकि वह प्रोटीन की प्रतियां बना सके और जारी कर सके।
  • शोध से जुड़े वैज्ञानिक के मुताबिक यह वास्तव में बीयर के उत्पादन के समान है। शराब उत्पादित करने के बजाय, इस मामले में, यीस्ट रिकॉम्बिनैंट प्रोटीन जारी उत्पादित कर रहा था। 
  • इसके पश्चात, प्रोटीन को शुद्ध किया गया ताकि यीस्ट (खमीर) को कोई भी अवशेष नहीं रह जाये। इस तरह इसे पूर्णतः ‘प्रिस्टेन’ यानी मूल प्रकृति का रूप दिया गया। फिर, इम्यून रिस्पॉन्स को बेहतर ढंग से उत्प्रेरित करने के लिए एक सह-औषधि का उपयोग करके टीका तैयार किया गया।
  • टीके की अधिकांश सामग्रियां सस्ती और आसानी से मिल जाने वाली हैं।
  • अगस्त 2020 में बायलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन ने इस वैक्सीन के लिए अपने प्रोडक्शन सेल बैंक को बायोलॉजिकल-ई को ट्रांसफर कर दिया, ताकि हैदराबाद की कंपनी ट्रायल के जरिए कैंडिडेट को ले जा सके।
  • वैक्सीन को तीसरे चरण के परीक्षणों के लिए मंजूरी मिल गई है, और सरकार का उम्मीद है कियह परीक्षण जुलाई तक खत्म हो जाएगी।

अन्य टीकाओं से कोर्बेवैक्स भिन्न कैसे?

  • अब तक कोविड-19 के खिलाफ प्रतिरक्षा हेतु जिन भी टीकाओं को मंजूरी दी गईं हैं वे या तो एमआरएनए (mRNA) टीकाएं हैं जैसे कि फाइजर और मॉडर्ना की टीकाएं, या फिर वायरल वेक्टर वैक्सीन हैं (एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड / कोविशील्ड, जॉनसन एंड जॉनसन और स्पुतनिक वी) या निष्क्रिय वायरस टीके (कोवैक्सिन, सिनोवैक-कोरोनावैक और सिनोफार्म की सासर्व-सीओवी2-वेरो सेल) हैं। 
  • निष्क्रिय टीके, जिसमें पूरे सार्स-सीओव-2 वायरस के मारे गए कण शामिल हैं, वायरस की पूरी संरचना को लक्षित करने का प्रयास करती हैं। दूसरी ओर, कोर्बेवैक्स, एमआरएनए एवं  वायरल वेक्टर कोविड-19 टीकों की तरह, केवल स्पाइक प्रोटीन को लक्षित करता है, लेकिन  अलग तरीके से।
  • वायरल वेक्टर और एमआरएनए और टीके स्पाइक प्रोटीन बनाने के लिए हमारी कोशिकाओं को उत्प्रेरित करने के लिए एक कोड का उपयोग करते हैं जिसके खिलाफ शरीर को प्रतिरक्षा का निर्माण करना होता है।
  • अधिकांश अन्य कोविड-19 टीकों की तरह, कॉर्बेवैक्स की दो खिराक दी जानी हैं। हालांकि, चूंकि इसे कम लागत वाले प्लेटफॉर्म का उपयोग करके बनाया गया है, इसलिए यह देश में उपलब्ध सबसे सस्ती टीकों में से एक होने की भी उम्मीद है।

कोर्बेवैक्स-भारत के लिए महत्वपूर्ण कैसे?

  • यह पहली बार है जब भारत सरकार ने एक ऐसी वैक्सीन की खरीद के लिए  आदेश दिया है जिसे आपातकालीन उपयोग प्राधिकरण (ईयूए) प्राप्त नहीं हुआ है।
  • भारत सरकार ने इसके लिए  1,500 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया है जो 15 करोड़ भारतीय नागरिकों की टीकाकरण सुनिश्चित कर सकती है।
  • केंद्र सरकार ने वैक्सीन के विकास के लिए प्रमुख प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षण सहायता प्रदान की है, जिसमें जैव प्रौद्योगिकी विभाग से 100 करोड़ रुपये की सहायता अनुदान भी शामिल है।
  • भारत द्वारा इतना बड़ा ऑर्डर देने की एक बड़ी वजह वैक्सीन की आपूर्ति बढ़ाने में हो रही मुश्किलें हैं। जहां अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने फाइजर, एस्ट्राजेनेका और मॉडर्ना जैसी टीकों के लिए अग्रिम भुगतान और जोखिम वाले निवेश किए थे, वहीं भारत सरकार ने सीमित ऑर्डर देने से पहले अपनी दो स्वदेशी टीकों को मंजूरी मिलने तक इंतजार किया।
  • सरकार द्वारा विदेशी टीकों के लिए नियामक आवश्यकताओं में ढील दिए जाने के बाद भी, उसे फाइजर और मॉडर्ना जैसी कंपनियों से तुरंत जवाब नहीं मिला। इसका कारण है कि उनकी आपूर्ति पहले से ही अन्य देशों द्वारा दिये गये ऑर्डर के खिलाफ की जा रही है।
  • भारत वर्तमान में फाइजर के टीके की सीमित आपूर्ति के लिए बातचीत कर रहा है, और इस साल दिसंबर तक कोविड के टीकों की दो बिलियन खुराक तक सुरक्षित होने की उम्मीद कर रहा है। जिस आसानी से इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है, उसे देखते हुए, कॉर्बेवैक्स इस अपेक्षित आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा बना सकता है और दिसंबर 2021 तक देश के सभी नागरिकों का टीकाकरण करने का लक्ष्य पूरा किया जा सकता है।

बायोलॉजिकल-ई के बारे में

  • बायोलॉजिकल-ई, जिसका मुख्यालय हैदराबाद में है, की स्थापना डॉ डी. वी. के. राजू ने 1953 में एक जैविक उत्पाद कंपनी के रूप में की थी जिसने भारत में हेपरिन (heparin) के उत्पादन का बीड़ा उठाया था।
  • 1962 तक, इसने बड़े पैमाने पर डीपीटी (DPT) टीकों का उत्पादन करते हुए, टीकों के क्षेत्र में प्रवेश किया। आज, यह भारत में प्रमुख टीका निर्माताओं में से एक है और और खुद को दुनिया में टेटनस टीका का सबसे बड़ा उत्पादक मानती है।

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