वि-भूमण्डलीकरण प्रक्रिया (De-globalization process)

विभूमण्डलीकरण का अर्थ है वैश्वीकरण से विपरीत दिशा में वापसी, यानी वैश्वीकरण से पुनः राष्ट्रवाद के रास्तों पर लौटना। मंदी के पश्चात् के परिदृश्य में दुनिया वैश्वीकरण की दिशा से लौटती दिख रही है। जहां प्रत्येक देश का राजनीतिक नेतृत्व वैश्वीकरण से विपरीत दिशा में चलने का संकेत देता हुआ अपने देश की जनता को यह सन्देश देने की कोशिश में लगा है कि वैश्वीकरण से राष्ट्रवाद की ओर वापसी उसकी सारी समस्याओं का निवारण है।

चर्चा के कारण?

  • अमेरिका द्वारा मार्च 2020 में कुछ देशों से इस्पात और एल्यूमीनियम के आयात पर क्रमशः 25% और 10% का शुल्क लगाया गया था। इसके लिये राष्ट्रीय सुरक्षा और रोज़गार सृजन जैसे कारणों का हवाला दिया गया था। इसके बाद से ही ‘व्यापार युद्ध’ (Trade War) और ‘वि-वैश्वीकरण’ जैसे शब्द चर्चा में आए है। 
  • इसके बाद लगभग 1300 अन्य चीनी उत्पादों पर 25% टैरिफ लगाया गया, जिसकी प्रतिक्रिया में चीन ने भी अखरोट, किशमिश और बादाम सहित कई अमेरिकी आयातों पर अतिरिक्त कर लगाकर जवाबी हमला किया।
  • अमेरिका और चीन के बीच छिड़े इस व्यापार युद्ध में लगभग $100-150 बिलियन राशि दाँव पर लगी हुई है।
  • यूरोपीय संघ भी कुछ अमेरिकी उत्पादों पर 25% के शुल्क के साथ इस व्यापार युद्ध में कूद गया है। 

पृष्ठभूमि:

धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद में राजनीति का उभरना

अमेरिका, ऑस्ट्रिया, फ्रांस, लंदन, पोलेंड, रूस आदि देशों में ऐसे दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों और उसके नेतृत्व की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है जो इस तरह के एजेंडे को आगे रखते हुए वहाँ के लोगों को अतीत के गौरव एवं महानता की पुनर्बहाली और सुनहले भविष्य का सपना दिखा रहे हैं। ब्रेक्जिट अर्थात् यूरोपीय संघ से ब्रिटेन का बाहर निकलना, अमेरिका में ट्रम्प की जीत और जीत के पश्चात् ट्रम्प का आर्थिक संरक्षणवादी एजेंडे को अपनाना उसी दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद के उभारने का संकेत दे रही है जो भूमंडलीकरण के भविष्य को लेकर अस्पष्ट तस्वीरें निर्मित कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा ट्रांस-पेसिफिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट, ट्रांस-अटलांटिक ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप एग्रीमेंट और जलवायु समझौतों से अलग होने की घोषणा के साथ-साथ अमेरिका के द्वारा विभिन्न देशों के साथ संपन्न मुत्तफ़ व्यापार समझौतों की समीक्षा इसी ओर इशारा कर रहे हैं।

अमेरिका के अलावा, यूरोपीय देशों में भी इस प्रक्रिया को देखा जा सकता है। यूनाइटेड किंगडम में यूनाइटेड किंगडम इंडिपेंडेंस पार्टी के निजेल फराज के नेतृत्व में ब्रेक्जिट के लिए सफलतापूर्वक आन्दोलन चलाये गए और इसने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी जिसने यूनाइटेड किंगडम को बिऽराव के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है और ब्रेक्जिट के विरोध में स्कॉटलैंड, ब्रिटेन से अलग होने की स्थिति है। यूरोपीय संघ से बाहर निकलने की माँग अब ब्रिटेन से बाहर निकलकर यूरोपीय संघ के अन्य देशों में भी फैल रही है। फ्रांस में नेशनल फ्रंट के मैरीन ले पेन के नेतृत्व में फ्रेक्जिट और नीदरलैंड में पार्टी फॉर फ्रीडम के गीर्ट विल्डर्स के द्वारा नेक्जिट के लिए आन्दोलन चलाया जा रहा है जो यूरोपीय संघ से जुड़ाव के प्रति यूरोपीय देशों में गहराते असंतोष की ओर स्पष्ट संकेत करता है। इनके अन्दर यह अहसास गहराता जा रहा है कि यूरोपीय संघ से जुड़कर उन्होंने काफी कुछ गँवाया है। स्पष्ट है कि भारत, ब्रिटेन और अमेरिका की तरह ही फ्रांस, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी, फिनलैंड, नीदरलैंड और स्वीडन जैसे यूरोपीय देशों में भी धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद राजनीतिक उभार की प्रक्रिया तेज हो रही है।

वि-वैश्वीकरण चिंता का विषय क्यो:

वि-वैश्वीकरण वितीय बाज़ार के निवेशकों के लिये चिंता का विषय है। मार्च 2020 में व्यापार युद्ध के चर्चा में आने के बाद से BSE (Bombay Stock Exchange) के मेटल इंडेक्स (Metals Index) में 13 फीसदी की गिरावट हुई है।वि-वैश्वीकरण से वैश्विक वित्तीय बाज़ारों की स्थिति में आ रहे सुधार की गति मंद पड़ सकती है। जिस सिद्धांत को अभी वस्तुओं पर लगाया गया है, उसे लोगों पर भी लगाया जा सकता है, इससे वैश्विक श्रम बाज़ार की गतिशीलता प्रभावित हो सकती है।

     अमेरिका और ब्रिटेन पहले ही बाहर से आने वाले लोगों के लिये बहुत कठोर अप्रवासन मानदंडों का निर्माण कर चुके हैं। यद्यपि टैरिफ युद्ध वि-वैश्वीकरण नीतियों का एक पहलू है लेकिन कुछ देशों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने के कारण बिना किसी व्यापारिक समझौते के दोनों पक्षों की कंपनियों को प्रतिवर्ष लगभग $80 बिलियन तक की अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ सकती है।

  • हम अभी भी एक उच्च वैश्वीकृत दुनिया में रहते हैं और ऐसे संरक्षणवादी कदम उन बुनियादी नियमों के विपरीत है जिनके आधार पर वैश्विक विकास का अनुमान लगाया जाता है तथा विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे संगठन वैश्विक व्यापार को विनियमित करते हैं।
  • जब बड़े, औद्योगीकृत और समृद्ध राष्ट्र वस्तुओं और सेवाओं के प्रवेश को कठिन बनाने के लिये आगे आते हैं तो इससे उनके कई व्यापारिक भागीदारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • वैश्विक आर्थिक विकास, मुद्रास्फीति और ब्याज दरों की सभी गणनाओं में फिर से गड़बड़ हो सकती है।
  • उदाहरण के लिये, अमेरिकी अर्थव्यवस्था चीन से बहुत सस्ती विनिर्मित वस्तुओं का आयात करती है। यदि टैरिफ युद्ध में अमेरिका में आयात की लागतें बढ़ती हैं, तो घरेलू मुद्रास्फीति में बहुत तेज़ी से वृद्धि हो सकती है और अमेरिकी ब्याज दरों में तेजी से बढ़ोतरी हो सकती हैं।

भारत पर प्रभाव

  • हाल ही में लिये गए इन टैरिफ निर्णयों का भारत पर ज़्यादा प्रभाव नहीं देखने को मिलेगा क्योंकि अमेरिका, भारत से अपने स्टील और एल्यूमिनियम के कुल आयात का केवल 1% ही प्राप्त करता है।
  • लेकिन सेवाओं और श्रम के संदर्भ में वि-वैश्वीकरण से सेवाओं के निर्यात एवं उच्च शिक्षा तथा नौकरियों के लिये विदेशों में प्रवास करने वाले भारतीय नागरिकों पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

विभूमण्डलीकरण के कारण

  • वैश्वीकरण के लाभों का असमान वितरण।
  • विकसित देशों में आय की बढ़ती असमानताएँ और रोज़गारों का नुकसान।
  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रसार और श्रम के मुक्त आवागमन के कारण विकसित देशों में ऐसी धारणाओं को बल मिला है कि विकासशील देशों के श्रमिकों के कारण विकसित देशों में रोज़गारों का नुकसान हुआ है।
  • इससे विकसित देशों में कठोर वीज़ा व्यवस्था और उद्योगों के स्थानांतरण की मांग को बढ़ावा मिला है।
  • 2008 में आई वैश्विक मंदी ने ऐसी स्थिति को और ज़्यादा गंभीर कर दिया फलस्वरूप पूरे विश्व में संरक्षणवादी नीतियों को अपनाने की मांग में वृद्धि हुई।
  • विभिन्न देशों में लोक-लुभावन राजनीतिक नेतृत्व के उदय से विश्व स्तर पर ऐसी प्रवृत्तियाँ तेज़ी से बढ़ी हैं।
  • ISIS जैसे आतंकवादी संगठनों के उदय, विकसित देशों में आतंकवादी हमलों की बढती घटनाएँ और उभरते नए सुरक्षा खतरों ने प्रवासी संकट को बढ़ावा दिया है।
  • इन कारकों के वैश्विक मंदी के साथ संयुक्त हो जाने से आर्थिक संरक्षणवाद की प्रवृतियाँ देखने को मिल रही हैं।
  • वैश्वीकरण के कारण असंतोष: 1980 के दशक तथा उसके उपरांत विकसित देशों ने उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के जिस मॉडल को आर्थिक संकट से बाहर निकालने एवं आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया को त्वरित करने के नाम पर विकासशील देशों के ऊपर थोपा, उसने भले ही आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया को त्वरित करते हुए भौगोलिक प्रगति के मुकाम पर पहुंचाया हो वहीं गरीबों को और अधिक गरीब बनाया है। इसका लाभ अत्यधिक अमीर एवं मध्यम वर्ग को तो मिला है, पर अधिकांश आबादी, विशेषकर औद्योगिक देशों में कामगार एवं निम्न-मध्यवर्ग और विकासशील देशों में गरीब, बेरोजगार एवं हाशिये पर के समूह से सम्बद्ध वंचितों की विशाल आबादी इसके लाभों से वंचित रही। एक तो इसने ‘जॉबलेस ग्रोथ’ अर्थात्‌ रोजगार-विहीन संवृद्धि की स्थिति को जन्म दिया, दूसरे जो थोड़े-बहुत रोजगार सृजित हुए भी, वे निम्न उत्पादकता वाले रोजगार थे।
  • राष्ट्रवाद कॉर्पोरेट-नियंत्रित पूँजी की आवश्यकताः भूमंडलीकरण ने कॉर्पोरेट द्वारा निर्देशित ऐसे सर्वव्यापी बाजार को सृजित किया है जो आज अपनी लाभ-केन्द्रित सोच के कारण तमाम आर्थिक सिद्धांतों, नियमों एवं विनियमों और यहाँ तक कि राष्ट्र-राज्यों एवं वहाँ की सरकारों तक की गिरफ्त से बाहर निकलकर अपनी मनमानी पर उतर चुका है।
  • वैश्विक मंदी (2008-09 की पृष्ठभूमि में वैश्वीकरण के अंतर्विरोधों का गहराना): वैश्वीकरण के अंतर्विरोधों को मुखर करने में 2008-09 के वैश्विक वित्तीय-सह-आर्थिक संकट और उसके बाद अनिश्चित आर्थिक परिदृश्य की निरंतरता ने महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका निभायी। अधिकांश देशों ने वैश्वीकरण की इन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए आर्थिक संरक्षणवाद का सहारा लिया, लेकिन इससे न तो समस्या का समाधान मिल सकता था और न ही मिला। इसके विपरीत इन उपायों से समस्या का समाधान देने के बजाय वैश्वीकरण के अंतर्विरोध और गहरे हो गये।
  • बढ़ता हुआ सामाजिक-सांस्कृतिक द्वंद्व: इसने सांस्कृतिक द्वंद्व को जन्म देते हुए स्थानीय लोगों में अप्रवासियों के प्रति असंतोष को जन्म दिया। इस असंतोष को विकासशील देशों से विकसित देशों की ओर प्रवास के बढ़ते हुए दबाव ने उत्प्रेरित करने का काम किया।
  • इस्लामिक चरमपंथियों की चुनौती: बढ़ते हुए टकराव की पृष्ठभूमि में इन इस्लामिक चरमपंथी संगठनों ने अमेरिका एवं इन यूरोपीय देशों पर आतंकी हमले बढ़ा दिए। इन परिस्थितियों में स्थानीय लोगों में न केवल मुसलमानों के प्रति असंतोष पैदा हुआ और उन्हें आशंका भरी नजरों से देखा जाने लगा वरन्‌ स्थानीय लोगों ने इन्हें अपनी खतरा समझते हुए अपने राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल भी माना।
  • नव-आर्थिक उदारवाद से मोहभंग: 21वीं शताब्दी के आरम्भ तक आते-आते नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों की परिणति बढ़ती हुई सामाजिक-आर्थिक असमानता एवं जॉबलेस वृद्धि की स्थिति के कारण उच्च बेरोजगारी दर के रूप में हुई और इसने इस मॉडल से मोहभंग का आधार तैयार किया। इसी पृष्ठभूमि में 21वीं सदी के पहले दशक में दस लैटिन अमेरिकी देशों ने वामपंथ की ओर रुख किया, यद्यपि अर्जेंटीना, ब्राजील, चिली, ग्वाटेमाला और वेनेजुएला में भ्रष्टाचार के उच्च स्तर एवं आर्थिक हेराफेरी के आरोपों के बीच वामपंथ से मोहभंग की स्थिति भी देखने को मिली है।
  • मुख्यधारा के राजनीतिक दलों की विफलता: इसके परिणामस्वरूप गरीबों, शोषितों एवं वंचितों का मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से विश्वास उठता चला गया। उन्हें लगने लगा कि अब उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
  • इनके द्वारा सत्ता-प्रतिष्ठानों के विरुद्ध लोगों की नाराजगी को मुख्यधारा के राजनीतिक दलों की विफलता को भुनाने का प्रयास किया जा रहा है। अमेरिका और यूरोप में रोजगार एवं मजदूरी-संबंधी चिंताओं को अभिव्यत्तिफ़ देते हुए लोगों को राजनीतिक रूप से गोलबंद करने की कोशिश की जा रही है, ताकि आर्थिक संरक्षणवादी नीतियों के सहारे अप्रवासियों की प्रतिस्पर्धा से संरक्षण प्रदान करते हुए अच्छे दिन और अतीत के गौरव की पुनर्बहाली का नारा दिया जा रहा है।

भारत पर वि-भूमण्डलीकरण का प्रभाव:

  • आर्थिक प्रभाव: वैश्वीकरण से भारत के आर्थिक विकास की दर में कमी आएगी।
  • यह उन देशों के बीच कम सहयोग के साथ संरक्षणवाद को बढ़ावा देगा जो भारतीय व्यापार और निर्यात को नुकसान पहुंचाएगा।
  • वैश्वीकरण से प्रतिस्पर्धा में कमी आएगी और वस्तुओं और सेवाओं की सामान्य कीमतों में वृद्धि होगी।
  • यह रोजगार के अवसरों को नष्ट कर देगा क्योंकि यह वीजा नियमों जैसे संरक्षणवादी उपायों के कारण कुशल लोगों के बहिर्वाह को रोक देगा। यह उनकी रोजगार क्षमता और राष्ट्र को प्रेषण को प्रभावित करेगा।
  • इससे कम विकल्प और विकल्पों के कारण आयात लागत में वृद्धि हो सकती है और निर्माताओं और उत्पादकों को विदेशी बाजारों से उपकरण, वस्तुओं और मध्यवर्ती उत्पादों के लिए अधिक भुगतान करना होगा।
  • सामाजिक प्रभाव:
  • इससे जीवन स्तर में कमी आएगी क्योंकि यह निर्यात और आर्थिक विकास को प्रभावित करेगा जिससे गरीबों के कल्याण और उनके जीवन स्तर पर असर पड़ेगा।
  • इससे आर्थिक और राजनीतिक रूप से संघर्षों में वृद्धि होगी।
  • राजनीतिक प्रभाव: यह कीमतों में वृद्धि और जीवन यापन की लागत के कारण राष्ट्रों के राजनीतिक ढांचे में अस्थिरता के कारण राजनीति को प्रभावित करेगा, जिससे नागरिक विद्रोह हो सकता है।
  • प्रौद्योगिकी पर प्रभाव: ये प्रवृत्तियाँ संपूर्ण विश्व और विशेष रूप से विकासशील देशों की तकनीकी प्रगति को सीमित करती हैं। सीमित ज्ञान साझाकरण, विकासशील देशों में प्रौद्योगिकी के प्रवाह की कमी विज्ञान में प्रगति को सीमित करती है।
  • पर्यावरणीय बातचीत पर प्रभाव: राष्ट्रों के बीच असहयोग के कारण यह भारत में पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को प्रभावित करेगा। यह आवश्यक धन को कम करेगा और पर्यावरण के संरक्षण और पर्यावरण परिवर्तन से निपटने के प्रयासों को खतरे में डाल देगा। इससे संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन में समन्वय की कमी होगी जहां देश पर्यावरण परिवर्तन जैसी विभिन्न समस्याओं के लिए एक समान बिंदु पर नहीं आ सकते हैं। यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नष्ट कर देता है।
  • महिला रोजगार पर प्रभाव: वैश्वीकरण महिला सशक्तिकरण के प्रयासों को प्रभावित करेगा क्योंकि यह दुनिया भर में महिला आंदोलनों को प्रभावित करेगा। समन्वय की कमी से दुनिया भर में महिलाओं के लिए अवसर कम होंगे।
  • सुरक्षा पर प्रभाव: विभिन्न राष्ट्रों के बीच समन्वय की कमी के कारण भारत सहित दुनिया भर की सुरक्षा प्रभावित होगी। यह न केवल आर्थिक जोखिम बढ़ाएगा, बल्कि विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के कारण आतंकवादियों को हिंसा करने का अवसर प्रदान करेगा।
  • किसानों पर प्रभाव: कम समन्वय वाली दुनिया का अर्थ है कृषि निर्यात और भारतीय किसानों पर प्रभाव। भारतीय किसानों को पर्यावरण परिवर्तन और वैश्वीकरण की दोहरी मार झेलनी पड़ेगी।

वैश्वीकरण भारत को न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी नुकसान पहुंचाएगा। यह भारत में आर्थिक विकास को प्रभावित करेगा और भारतीय लोगों के कल्याण को नुकसान पहुंचाएगा। अधिक सामंजस्यपूर्ण वैश्विक संरचना को बढ़ाने के लिए एक समन्वित प्रयास की आवश्यकता है।

समर्थको का मत

कुछ विद्वान इसके समर्थक भी हैं। उनका मानना हे की यदि संतुलित एवं उचित कदम उठाये जाये तो इसके फायदे भी हो सकते हैं।

वाल्डन बेलो द्वारा वि-वैश्वीकरण के सिद्धांत

1. निर्यात बाजारों के लिए उत्पादन के बजाय घरेलू बाजार के लिए उत्पादन फिर से अर्थव्यवस्था के गुरुत्वाकर्षण का केंद्र बनना चाहिए।

2. समुदाय के स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर माल के उत्पादन को प्रोत्साहित करके आर्थिक जीवन में सहायकता के सिद्धांत को स्थापित किया जाना चाहिए यदि यह समुदाय को संरक्षित करने के लिए उचित लागत पर किया जा सकता है।

3. व्यापार नीति – यानी, कोटा और टैरिफ – का उपयोग स्थानीय अर्थव्यवस्था को कृत्रिम रूप से कम कीमतों के साथ कॉर्पोरेट-सब्सिडी वाली वस्तुओं द्वारा विनाश से बचाने के लिए किया जाना चाहिए।

4. औद्योगिक नीति – सब्सिडी, टैरिफ और व्यापार सहित – का उपयोग विनिर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित और मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए।

5. एक जीवंत आंतरिक बाजार बनाने के लिए समान आय पुनर्वितरण और भूमि पुनर्वितरण (शहरी भूमि सुधार सहित) के लंबे समय से स्थगित उपायों को लागू किया जाना चाहिए जो अर्थव्यवस्था के लंगर के रूप में काम करेगा और निवेश के लिए स्थानीय वित्तीय संसाधनों का उत्पादन करेगा।

6. विकास पर जोर देने से, जीवन की गुणवत्ता को उन्नत करने पर जोर देने और इक्विटी को अधिकतम करने से पर्यावरणीय असमानता कम हो जाएगी।

7. बिजली और परिवहन प्रणालियों को अक्षय स्रोतों के आधार पर विकेंद्रीकृत प्रणालियों में बदलना चाहिए।

8. देश की वहन क्षमता और उसकी जनसंख्या के आकार के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनाए रखना चाहिए।

9. कृषि और उद्योग दोनों में पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल प्रौद्योगिकी का विकास और प्रसार किया जाना चाहिए।

10. लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए आर्थिक निर्णय लेने के सभी क्षेत्रों में एक जेंडर लेंस लागू किया जाना चाहिए।

11. सामरिक आर्थिक निर्णय बाजार या टेक्नोक्रेट पर नहीं छोड़े जाने चाहिए। इसके बजाय, अर्थव्यवस्था में लोकतांत्रिक निर्णय लेने के दायरे का विस्तार किया जाना चाहिए ताकि सभी महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दे – जैसे कि कौन से उद्योग विकसित हों या चरणबद्ध हों, सरकारी बजट का कितना अनुपात कृषि को समर्पित किया जाए, आदि – लोकतांत्रिक के अधीन हो जाएं। चर्चा और चुनाव। यह अर्थशास्त्र के रहस्योद्घाटन और राजनीतिक अर्थव्यवस्था और नैतिक अर्थव्यवस्था के रूप में इसके मूल में वापसी की आवश्यकता होगी।

12.  नागरिक समाज को लगातार निजी क्षेत्र और राज्य की निगरानी और पर्यवेक्षण करना चाहिए, एक प्रक्रिया जिसे संस्थागत बनाया जाना चाहिए।

13. संपत्ति परिसर को एक ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ में परिवर्तित किया जाना चाहिए जिसमें सामुदायिक सहकारी समितियां, निजी उद्यम और राज्य उद्यम शामिल हों, और इसमें अंतरराष्ट्रीय निगम शामिल नहीं हैं।

14. आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे केंद्रीकृत वैश्विक संस्थानों को मुक्त व्यापार और पूंजी गतिशीलता पर नहीं बल्कि सहयोग के सिद्धांतों पर निर्मित क्षेत्रीय संस्थानों के साथ प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए, जो हमारे लोगों के लिए बोलिवेरियन विकल्प का वर्णन करने में ह्यूगो शावेज के शब्दों का उपयोग करते हैं, अमेरिका (ALBA), ‘पूंजीवाद के तर्क से परे।’

कोविड 19 और वि-वैश्वीकरण

कोरोना वायरस के सुर्खियां बटोरने और हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आमद से काफ़ी पहले से ही, दुनिया एक ख़तरनाक मोड़ पर खड़ी हुई थी. 2008-09 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से दुनिया लगातार सीधे इसी दिशा में बढ़ रही थी और मौजूदा वैश्विक आर्थिक उठा-पटक के मोड़ पर खड़ी थी। इन सबसे दुनिया के राजनीतिक एवं आर्थिक आभिजात्य वर्ग की क्षमता को लेकर ये प्रश्न उठ रहा था कि क्या वो प्रभावशाली प्रशासन देने में सक्षम होगा? और क्या ये कुलीन वर्ग उन लोगों की आकांक्षाओं का उचित प्रबंधन कर सकेगा जो संसाधनों से विहीन हैं।

और अब जब एक के बाद एक राष्ट्र अपने आप को अलग-थलग कर रहा है, ऐसे में कोरोना वायरस हमारी उस जीवन शैली को चुनौती दे रहा है, जिस तरह जीने और अपने जीवन को व्यवस्थित करने के हम अभ्यस्त हो चुके हैं. यही नहीं, कोविड-19 का बढ़ता प्रकोप वो पूरी विश्व व्यवस्था को भी चुनौती दे रहा है। आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों की असुरक्षा खुल कर सामने आ गई है।

ऐसा लगता नहीं है कि विशेषज्ञों के आज जब कोरोना वायरस का वैश्विक प्रकोप हर गुज़रते दिन के साथ व्यापक रूप से स्पष्ट होता जा रहा है, तो कोविड-19 के संकट के वैश्विक सप्लाई चेन पर प्रभाव की चर्चा भी आम होती जा रही है। वैश्विक अर्थव्यवस्था, जो पहले से ही संघर्ष कर रही थी, उसे कोरोना वायरस का सदमा लगने से, दुनिया भर में धन, सामान और लोगों के प्रवाह की वृद्धि करने का जो रहा-सहा सहयोग मिलने की संभावना थी, वो भी क्षीण हो चुकी है।

चीन में अभी भी वो क्षमता है कि वो इस चुनौती को झाड़ उठ खड़ा हो. चीन के लिए बड़ा संकट ये होगा कि कई वर्षों से वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ने के उसके प्रयासों में सहयोग कर रही पश्चिमी ताक़तें उससे मुंह फेर लें। अमेरिकी राष्ट्रपति के चीन के साथ व्यापार युद्ध के बड़े दांव का असर पहले ही दिख रहा है. दुनिया के तमाम उत्पादों के निर्माण केंद्र अब चीन से दूसरे देशों में विस्थापित हो रहे हैं. अब व्यापारिक और तकनीकी विच्छेद की दिशा में बढ़ रहे क़दम से एक नए तरह के संघर्ष का मंच स्थापित हो रहा है, जिसके कारण भूमंडलीकरण के मूलभूत तत्वों को चुनौती मिलेगी . जबकि, हम 1990 के दशक से भूमंडलीकरण के आदी हो चुके हैं।

ये भारत जैसे देशों के लिए बड़ी समस्या है, जिन्हें भूमंडलीकरण की ताक़त से काफ़ी लाभ प्राप्त हुआ है। क्योंकि सूचना, विचारों, नौकरियों और लोगों के मुक्त प्रवाह से भारतीय नागरिकों को समृद्ध होने का अवसर अभूतपूर्व रूप से प्राप्त हुआ है। लेकिन, अब जबकि विश्व परिदृश्य में तीव्रता से परिवर्तन आ रहा है, तो ऐसे में भारत के निति-नीर्माताओं को ऐसा रास्ता निकालना होगा, जिससे भारत नए उभर रहे अवसरों का अधिकतम लाभ उठा सके। क्योंकि आज पुरानी वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं बाधित हो रही हैं और उनकी जगह व्यापार एवं निवेश की नई व्यवस्था का निर्माण किया जा रहा है।

यथार्थवादी लंबे समय से ये तर्क देते रहे हैं कि जितना अधिक दुनिया एक दूसरे से जुड़ी होगी, उतनी ही असुरक्षाएं भी उत्पन्न होंगी। लेकिन, ये बहुत साधारण सा सबक़ भी भूमंडलीकरण के अति आत्मविश्वास का शिकार बन गया। अब जबकि वो आत्मविश्वास घट रहा है, तो ऐसे में भय इस बात का है कि जो सबक़ हम सीख रहे हैं, कहीं उनसे और क्षति न हो जाए।

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