निजी डेटा सुरक्षाः निजता व आवश्यकता के बीच संतुलन की जरूरत

           निजी डेटा सुरक्षाः निजता आवश्यकता के बीच संतुलन की जरूरत

       वर्तमान में भारत दुनिया में इंटरनेट का दूसरा सबसे बड़ा उपयोगकर्त्ता है और कई वैश्विक कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार भी है जिन्होंने डिजिटल सेवाओं के अलग-अलग वर्गो में अपना वर्चस्व बना लिया है।

          फेसबुक सोशल नेटवर्किंग पर अपना प्रभुत्व स्थापित किये हुये है, वहीं गूगल ने पूरी तरह से ऑनलाइन सर्च और ईमेल पर कब्जा कर लिया है, और अमेजन ऑनलाइन वाणिज्य पर कब्जा जमाये बैठा है।

         स्थानीय कंपनियां भी इनके व्यवसाय मॉडल रणनीतियों को सीख रही हैं।

         इन कंपनियों में भले ही प्रतिस्पर्धा हो परंतु करोड़ों भारतीयों के ऑनलाईन व्यवहार के संग्रहण, भंडारण विश्लेषण  के एकल लक्ष्य में सभी कंपनियां एक ही तरफ खेड़े दिखते हैं। इस तरह इन कंपनियों के व्यवसाय मॉडल में व्यक्तिगत डाटा हासिल करना अधिक मायने रखता है।

 

         सूचना हासिल करने का और जरिया सरकार है। भारत विश्व के उन चंद देशों में है जहां सरकार के पास अनिवार्य राष्ट्रीय बायोमेट्रिक आईडी योजनाआधारके रूप में निजी डेटा का विशाल भंडार है।

-इन सबके विश्लेषण से यही लगता है कि व्यक्तिगत डेटा वायु का रूप ले चुका है जो जीवन के लिए अनिवार्य है।

          भारत में डेटा को सुरक्षित रखने के लिए एक आईटी एक्ट 2000 है जो कई खामियों से युक्त है। वहीं यूरोपीय संघ से तुलना की जाये तो उसने एक अत्याधुनिकजनरल डेटा प्रोटेक्श्न रेगुलेशन’ (जीडीपीआर) विकसित करने के लिए काफी समय लिया है और कुछ ही महीनों में यह प्रभावी भी होने वाला है। भारत को इस यूरोपीय प्रणाली की  ओर देखने की जरूरत है। 

         जीडीपीआर एक प्रगतिशील साधन है। जीडीपीआर की  प्रस्तावना ही, डेटा संरक्षण कानून के माध्यम से व्यक्तियों  के अधिकारों की रक्षा करने का प्रयास करता है। इसमें उद्योगों और सरकार की सीमित आवश्यकताओं को अपवादों के रूप में शामिल किया गया है। इस तरह व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा आवश्यकता के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

         यह संतुलन डेटा संरक्षण कानून के तहत निजता के अधिकार के सैद्धांतिक संरक्षण की मान्यता से होती है और सरकार तथा उद्योग की आवश्यकता रूपी अपवाद के लिए जो जगह बनायी  गयी है वह आवश्यकता और आनुपातिकता के कानूनी सिद्धांतों के तहत निर्धारित है।  

           ऐसे सिद्धांतों को जीडीपीआर के भीतर कानूनी अभिव्यक्ति मिली है जो उन्हें व्यावहारिक रूप से लागू करने योग्य बनाती है। उदाहरण के तौर पर

            इसमें डेटा प्रसंस्करण की एक पारदर्शी प्रणाली शामिल है जिसके तहत किसी व्यक्ति के डेटा उपयोग की प्रतिपल जानकारी उस तह पहुंचती रहती है जिससे व्यावहारिक रूप से उसे जागरूक बनाता है।

            साथ ही इन डेटा का उपयोग मूल उद्देश्यों तक ही सीमित होता है जिनके लिए इसे प्राप्त किया गया है। 

            ऐसा नहीं है कि इस प्रकार के संतुलन की व्यवस्था हमारे संविधान में नहीं है। अगस्त 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार की मान्यता देते हुये इसी न्यायालय द्वारा 1959 के उस कानून को रद्द कर दिया<

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