लिंगायत को अलग धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में पहचानः इतिहास व तर्क

लिंगायत को अलग धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में पहचानः इतिहास व तर्क

लिंगायत विद्वान व कर्नाटक विश्वविद्यालय धारवाड़ के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एन जी महादेवप्पा अपनी ‘लिंगायतवादः एक स्वतंत्र धर्म में लिंगायतवाद को एक अलग धर्म के रूप  में मान्यता देने के पीछे तर्क देते हैं कि ‘लिंगायत सख्ती से एकेश्वरवाद का पालन करते हैं। वे केवल एक भगवान की पूजा, अर्थात् लिंग (शिव) में आस्था रखते हैं। यहाँ ध्यान दिया जाना चाहिए कि यहां ‘लिंग शब्द का अर्थ मंदिरों में स्थापित लिंग से नहीं है, बल्कि सार्वभौमिक ऊर्जा (शक्ति) द्वारा अभिप्रेरित सार्वभौमिक चेतना से है।

कौन हैं लिंगायत ?

-लिंगायत, जिन्हें वर्तमान में हिंदू धर्म में ‘वीरशैव लिंगायत नामक उपप्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, को अक्सर शैव माना जाता है। यह एक विरोधाभास ही है कि जिसकी उत्पति 12वीं शताब्दी के दार्शनिक-संत बासवन्ना के नेतृत्व में  हिंदू समाज के दलित वर्गों को जातीय बंधन को तोड़ने व खुद से सत्य की पहचान के आंदोलन से हुयी उसे आज एक उपजाति के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

अलग धर्म की मांग

1.हालांकि लिंगायत को एक अलग धर्म के रूप में पहचान की मांग लगभग सात दशकों से होती रही है परंतु इनकी मांग उस समय कमजोर पड़ गयी जब हिंदू धर्म का पालन करते हुये ही बड़ी संख्या में वीरशैवों ने लिंगायत को अपना लिया।

2. लिंगायतों के वीरशैव के साथ अत्यधिक मेल-मिलाप से बासवन्ना के दर्शन व सिद्धांत पृष्ठभूमि में चली गयी । परंतु  समुदाय के 300 से अधिक मठों में यह चिंताएं जरूर उत्पन्न होने लगी कि उनके द्वारा कर्नाटक में संचालित सैकड़ों स्कूलों और कॉलेजों के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए लिंगायतवाद को अलग धर्म के रूप में पहचाना ही जाना चाहिए।

3. कर्नाटक के सेवानिवृत्त नौकरशाह व लिंगायतों के अलग धर्म के पैरोकार एस.एम.जमादार के अनुसार 1930 तक आधिकारिक सर्वेक्षण में लिंगायत को वीरशैव के साथ ‘वीरशैव लिंगायत समुदाय के रूप में पहचान होती रही। 1941 में समुदाय की महासभा को ‘ऑल इंडिया लिंगायत महासभा के नाम से कहे जाने पर सहमति बनीं परंतु इसका क्रियान्वयन नहीं हो सका और वे ‘ऑल इंडिया वीरशैव महासभा के नाम से ही जाने गये।

अलग धर्म के रूप में पहचान हेतु प्रयास

1.हाल में लिंगायतों को अलग धर्म के रूप में पहचान दिलाने के लिए विशेष तौर पर प्रयास आरंभ हुये हैं। वर्ष 2013 में लिंगायतों को अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के रूप में पहचान दिलाने की मांग की गई।

2. जुलाई 2017 में उत्तरी कर्नाटक के बीदर में एक लाख लोगों ने सिद्दरमैया सरकार पर दबाव बनाने के लिए जमा हुये। यहां एक प्रस्ताव पारित कर बीदर उपायुक्त के माध्यम से मुख्यमंत्री से मांग की गई कि वे केंद्र सरकार से लिंगायत को एक अलग अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के रूप मान्यता देने का मुद्दा उठाये। साथ ही उन्होंने यह भी मांग रखी कि उन्हें ‘लिंगायत के रूप में मान्यता दी जाये न कि ‘वीरशैव लिंगायत के रूप में।

3. कर्नाटक के बगलकोट, बेलगाम और बीदर जहां लिंगायतों का प्रभुत्व है हजारों लोगों की नियमित सभा होती रही है।

4. आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस समुदाय को अलग अल्पसंख्यक धार्मिक पहचान दिलाने के लिए मौजूदा राज्य सरकार भी अभिरूचि दिखाती रही है।

5. जमादार तर्क देते हैं  कि ‘हिंदू विवाह अधिनियम 1955’ तथा  ‘हिंदू उत्तरधिकार अधिनियम 1956’  के तहत लिंगायत, बौद्ध, जैन एवं सिख को हिंदू के रूप में शामिल किया गया है किंतु केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा क्रमशः 1993, 1963 व व 2014 से बौद्ध, जैन एवं सिख को धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता प्राप्त है, केवल लिंगायत को ही ऐसी पहचान नहीं मिल पायी है। यदि लिंगायत को भी अलग धार्मिक अल्पसंख्यक  की पहचान मिल जाती है तो वे भी संविधान के अनुच्छेद 25, 28, 29 व 30 की सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।

6. हाल में सिद्दरमैया सरकार ने सभी सरकारी  कार्यालयों में बासवन्ना की तस्वीर लगाने के आदेश दिये हैं तथा अक्कामहादेवी के नाम पर एक विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा भी की गई है।

 

Source: http://indianexpress.com/article/explained/separate-lingayat-religion-an-old-demand-powered-by-new-politics-5105058/

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