जल संकट व जल सुरक्षा का प्राकृतिक समाधान

जल संकट जल सुरक्षा का प्राकृतिक समाधान

विश्व जल दिवस (करीब 22 मार्च) एक अवसर उपलब्ध करा रहा है जिस पर एक बार फिर से इससे जुड़े संकट पर चर्चा करें। इस वर्ष की विश्व जल विकास रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि जल से जुड़ी अधिकांश चुनौतियों का समाधान प्रकृति आधारित प्रणालियों  में छिपा है, यहां तक कि यह प्रणाली वर्ष 2030 सतत विकास एजेंडे के अनुकूल भी है। हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए की 'चलता  है वाले दृष्टिकोण' से जल सुरक्षा संबंधी चुनौतियां का सामना नहीं किया जा सकता। 

प्रकृति आधारित समाधान कई क्षेत्रों में भी आशा जगाती है जैसे कि सतत खाद्य उत्पादन, उन्नत मानव बस्तियां, पेयजल आपूर्ति और स्वच्छता, जल से जुड़ी आपदा जोखिम  न्यूनीकरण, और जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का प्रत्युतर देना इत्यादि।

कितनी बड़ी है चुनौती?

आज हमारे सामने पानी से संबंधित चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। दुनिया की आबादी वर्ष 2017  के 7.6 अरब से बढ़कर वर्ष 2050 में 9.4 से 10.2 अरब हो जाने की उम्मीद है जिनमें से दो-तिहाई आबादी शहरों में होगी। संयुक्त  राष्ट्र का अनुमान है कि इस अनुमानित वृद्धि का आधा हिस्सा अफ्रीका (1.3 अरब) और एशिया (0. 75 अरब) में होगा। इसलिए, जिस आबादी को पानी की सर्वाधिक जरूरत होगी वे विकासशील या उदीयमान अर्थव्यवस्थाओं में होंगी।

जलवायु परिवर्तन भी वैश्विक जल चक्र को प्रभावित कर रहा है, नम क्षेत्र और अधिक नम हो रहे हैं तो शुष्क क्षेत्र और  शुष्क हो रहे हैं।  लगभग 3.6 अरब लोग अब उन क्षेत्रों  में रहते हैं, जो साल में कम से कम एक महीने तक पानी की कमी का सामना कर सकते हैं, जिसके वर्ष 2050 तक 4.8 से 5.7 अरब तक हो जाने की संभावना है। अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान का अनुमान है कि कुल मांग जो अभी 680 बिलियन क्युबिक मीटर (बीसीएम) है 2025 तक 833 बीसीएम और 2050 तक 900 बीसीएम तक हो जाएगी।

-भारत में जल सुरक्षा की स्थिति और भी गंभीर है। शहरी केंद्रों के पास अधिकांश जल निकाय अत्यधिक प्रदूषित हैं। नदी के संसाधनों पर अंतर-राज्य विवाद भी अधिक तीव्र और व्यापक होते जा रहे हैं

खराब हो रही है पानी की गुणवत्ता

जल से जुड़ी समस्या केवल जल की पहुंच तक ही सीमित नहीं है  वरन् जल की गुणवत्ता से भी जुड़ी है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत की लगभग 50 प्रतिशत अंतर-राज्य नदियां प्रदूषित हैं।  

क्या है प्रकृति आधारित समाधान?

1. आपूर्ति पक्ष प्रबंधन के द्वारा संपूर्ण जल संकट का प्रकृति आधारित समाधान उपलब्ध है। कृषि के लिए सतत जल की प्राप्ति का यह मुख्य समाधान माना जा रहा है।

2. कंजर्वेशन टिलेज, फसल विविधता, लेग्युम गहनता जैविक कीट नियंत्रण के साथ-साथ गहन-उच्च-इनपुट प्रणाली पर्यावरणानुकूल कृषि प्रणालियां हैं। ये प्रणालियां भू-संरक्षण पर दबाव को कम करती हैं, प्रदूषण कम करती हैं साथ ही अपरदन जल आवश्यकता को भी कम करती हैं।

 3. अपशिष्ट जल शोधन के लिए निर्मित नम भूमियां भी लागत प्रभावी होती हैं। इनका सिंचाई के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है।

4. वाटरशेड मैनेजमेंट भी एक और प्रकृति आधारित समाधान है, जो अन्य लाभों के अलावा स्थानीय आर्थिक विकास, रोजगार सृजन, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु लोचकता जैसे लाभ भी प्रदान करते हैं।

5. प्रकृति-आधारित समाधान परंपरागत और स्थानीय ज्ञान के साथ गहराई से जुड़े हुये हैं, जिसमें स्थानीय के साथ-साथ जनजातीय  आबादी के जल संचयन प्रबंधन  संबंधी ज्ञान भी शामिल हैं।

चेन्नई का उदाहरण

-इस क्रम में चेन्नई का उदाहरण देखा जा सकता हैं जहां  शहरी विकास के क्रम में किस प्रकार प्रकृति की उपेक्षा की गई।  पहले अत्यधिक वर्षा होने पर झील, तालाब, टैंक, नदियां एवं एक-दूसरे से जुड़ी नहर प्रणाली आवश्यक जल का भंडारण कर आधिक्य जल समुद्र में छोड़ देती थी। परंतु आज इन सभी जल निकायों का अतिक्रमण हो चुका है जिसका खामियाजा चेन्नईवासियों को भीषण बाढ़ के रूप में करना पड़ा। 

निष्कर्ष: उपर के विश्लेषण से स्पष्ट है कि सतत विकास के  लक्ष्यों की प्राप्ति में प्रकृति आधारित समाधान महत्वपूर्ण हैं। इनको अपनाने से केवल जल प्रबंधन में सुधार होगा वरन् जल सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है।

स्रोतःhttp://www.thehindu.com/opinion/op-ed/awash-in-water-crises/article23305620.ece

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