किसान मार्च व संकट समाधान

किसान मार्च संकट समाधान

गांधीजी का 1930 का  दांडी मार्च की वर्षगांठ पर मार्च 2018 में महाराष्ट्र में किसानों का एक सप्ताह का मार्च कई मायनों में अप्रत्याशीत था

-यह ज्यादातर शालीन और अनुशासित था, नेतृत्वविहीन था  और -विघटनकारी और अहिंसक भी , इसके बावजूद सुसंगठित था इस वजह से भी इस मार्च ने मुंबई के मध्यम वर्ग की सहानुभूति भी हासिल की और इन्हें सड़क के किनारे लोगों  ने भोजन भी कराया निशुल्क चिकित्सा सुविधा भी प्रदान की। 

-इस मार्च की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका सफल होना रहा।  राज्य सरकार ने इनकी सभी मांगों को स्वीकार कर लिया जिनमें; आदिवासियों को वन भूमि वापसी की लंबित मांग, ऋण  माफी का विस्तार तथा कृषि उत्पादों के लिए उच्चतर  मूल्य शामिल हैं। 

-किसानों की मांग जरूर मान ली गईं हो परंतु विगत कुछ वर्षों में देश भर में हुये किसान आंदोलनों ने हमें यह सोचने को विवश तो किया ही है कि आखिर उन्हें मार्च की जरूरत क्यों पड़ रही है? केवल चरम संकट सड़क जाम जैसी घटनाएं ही कृषि में निहित गहन चक्रीय संकट हमें सावधाान क्यों करती है?

-ऐसा नहीं है कि सत्तारूढ़ सरकारों ने किसानों की मांग पर ध्यान नहीं दिया है। नीतिगत सिफारिशों से संबंधित कई कमेटियां, आयोग, रिपोर्ट भी हैं। इसके बावजूद कृषि संकट समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। इसका दो ही मतलब है। या तो इनकी नीतिगत सिफारिशें काम नहीं कर रही हैं या फिर सिफारिश क्रियान्वयन में काफी बड़ा  अंतराल है। एक उदाहरण एम.एस.स्वामीनाथन किसान आयोग की  सिफारिश है जिसके 10 वर्ष हो चुके हैं परंतु इनकी कई सिफारिशों का क्रियान्वयन अभी शेष है।

प्राथमिकता क्या होनी चाहिये?

1 सबसे बड़ी प्राथमिकता कृषि पर आजीविका हेतु निर्भर श्रम बल में कमी की होनी चाहिये। बेरोजगारी निम्न उत्पादकताा के बावजूद किसान आजीविका के अन्य साधनों की  ओर नहीं जा पा रहे हैं। औद्योगिक वृद्धि व्यवसाय में सुगमता जैसे उपायों से अन्य क्षेत्रों  में यदि रोजगार सृजित होते हैं तो किसानों को उस ओर उन्मुख किया जा सकता है।

2.  खेती को व्यवसाय के रूप में लेने की जरूरत है और इसे अपने ही शर्तों पर उपयुक्तता ठहरानी होगी। ऐतिहासिक स्तर पर औद्योगिक मजदूरी को निम्न रखने के लिए कृषि मूल्यों को कम रखा जाता रहा है। यह एकाधिकार खरीद कानून एपीएमसी (कृषि उत्पाद बाजार कमेटी) की ओर इंगित करता है।  हालांकि इस समस्या के समाधान के लिए बिजली, सिंचाई, उर्वरक, साख इत्यादि के रूप  में सब्सिडी जरूर दी जाती रही है परंतु जरूरतमंदों तक यह फायदा नहीं पहुंच पायी है।

3.किसानों एवं खरीदाताओं के बीच प्रत्यक्ष  संपर्क में कोई विशेष प्रगति नहीं हो पायी है। कृषि क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश काफी सीमित हैं। आधे से अधिक किसानों की पहुंच औपचारिक साख तक नहीं है। अनुबंध कृषि भी लगभग प्रतिबंधित ही है।

4. स्पष्ट है कि संकट काफी गहरा है और कृषि ऋण  माफी इसका समाधान नहीं है जो कि अर्थव्यवस्था पर ही असर डालता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य से 50 प्रतिशत का अधिक भुगताान भी स्थायी समाधान  नहीं है।

5. वैसे सरकार द्वारा हाल में उठाये गये कुछ कदम जैसे कि नीम मिश्रित उर्वरक प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसे उपाय प्रशंसनीय है। इससे रिसाव में कमी आएगी। इसी तरह मृदा कार्ड भी सही दिशा में कदम है।

6. कृषि उत्पाद कंपनियों को कर अवकाश देना भी सही कदम है।

7. सरकार द्वारा अगले चार वर्षों में किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य संभव नहीं दिखता परंतु यह सरकार के उचित ध्येय को जरूर दर्शाता है। 

8. इस दिशा में एक बड़ा उपाय कृषि को वाणिज्यिक तौर पर बाजार आधारित उद्यम बनाने की होनी चाहिये।

स्रोत: http://www.thehindu.com/opinion/lead/read-the-distress-signals/article23314876.ece

 

 

maharashtra kisan march के लिए इमेज परिणाम

0 Comment

Leave a comment